शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019
Ghazal : diya mujh ko
रविवार, 1 दिसंबर 2019
Ghazal
शुक्रवार, 29 नवंबर 2019
Ghazal
रविवार, 24 नवंबर 2019
Ghazal : mera hai
गुरुवार, 21 नवंबर 2019
ग़ज़ल : ख़त्म हो गई
बुधवार, 20 नवंबर 2019
ग़ज़ल : होना है
मंगलवार, 19 नवंबर 2019
ghazal : Kyun nahi hai
शनिवार, 16 नवंबर 2019
ग़ज़ल : मैं अपनी ख्वाहिशों को संग-सार कर दूंगा
शुक्रवार, 15 नवंबर 2019
Ghazal : Batane Wala
मंगलवार, 12 नवंबर 2019
हो नहीं सकता
शुक्रवार, 1 नवंबर 2019
ग़ज़ल : ढूंढ़ता रहा
मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019
ग़ज़ल : रोज़ करता है
वो अपने ख्वाब को पैरों से रौंदा रोज़ करता है
इसलिए ही तो आइने से पर्दा रोज़ करता है
न जाने किसने कह दिया उससे उदासी तलाश कर
इसलिए ही वो बज़्मो में भटका रोज़ करता है
नहीं मुझको पसंद ख्वाहिश ए दिल की परस्ती अब
मगर ये दिल ख्वाहिश ए दीदार पैदा रोज़ करता है
वो ज़ालिम है ज़ुल्म ओ सितम काम है उसका
मगर इक ज़ुल्म कर ज़ालिम भी तड़पा रोज़ करता है
नहीं बस में उसके इक छाले का मदवा भी
मगर चारागर भी ईसा का दावा रोज़ करता है
नहीं है वस्ल ए उम्मीद अपने यार से लेकिन
ये कम है कि वो खिड़की से झांका रोज़ करता है
ये अख़्तर किस तरह की वाबस्तगी हुनर से तेरी
तू पहले ज़ख्म देता है और अच्छा रोज़ करता है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
रविवार, 20 अक्टूबर 2019
नज़्म: ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019
ग़ज़ल : तुझे हम इस क़दर देखें
हम तुम को इस क़दर देखें
तुम्हारे लब पे चश्म-तर देखें
ये तेरे शबनम ओ शबाब को
सारे दुनिया के सुखनवर देखें
तेरी चाहत को तेरी यादों को
हम देखें भी तो मुंतजर देखें
तेरे जिस्म-ए-मुनाव्वर को
चांदनी रातों में क़मर देखें
उसे किसी और का शेर पसंद आया है
हम अपनी ग़ज़लों को बे-असर देखें
इक ये बीमार-ए-इश्क़-ओ-मिजाज़
सारे दुनिया के चरागर देखें
'अख़्तर' तो अपने ख्वाबों में
बस तुम को देखे बेशतर देखे
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
सोमवार, 7 अक्टूबर 2019
ग़ज़ल : अच्छा नहीं करते
अच्छा है की तुम मुझको अच्छा नहीं करते
और मुझको बुरा कहते हो अच्छा नहीं करते
करते हो हम पर रोज़ नया इक सितम ग़ज़ब
और हमारे ज़ख्म भरते हो अच्छा नहीं करते
बढ़ते हो दिलों के फासले, जंग भी लगते हो
और अमन की बात करते हो अच्छा नहीं करते
मैं हूं बीमार-ए-इश्क मुझे बीमार रहने दो
इलाज-ए-इश्क करते हो अच्छा नहीं करते
'अख्तर' को चाहिए भी क्या बस इक सुकून-ए-दिल
और इससे तुम जुर्म कहते हो अच्छा नहीं करते
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019
ग़ज़ल: मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने
मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने
और मुझको इक घूंट न पिलाई लोगों ने
मैं तो उसके रूह का इक कैदी था
और मुझको दी है रिहाई लोगों ने
शाम सवेरे उसको मेरी याद आए
ऐसी मेरी की है बुराई लोगों ने
दिनभर दौड़ता रहता हूं जिस कागज़ पर
उस कागज़ में आग लगाई लोगों ने
वो ग़ज़ल थी मेरी और तू शायर था
'अख़्तर' को ये बात बताई लोगों ने
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
बुधवार, 2 अक्टूबर 2019
ग़ज़ल : मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे
मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे
लगता है शायरों की आदत नहीं तुम्हे
वो ग़ज़ल कहे बस गज़ल कहे और मुझ पर कहे
क्या ऐसी वैसी कोई भी हसरत नहीं तुम्हे ?
इक मुद्दत से खुद को मैं दुनिया से छिपा कर
बस तुमको चाहता हूं की हैरत नहीं तुम्हे
मैं हूं अपने अंदाज़ का अकेला दीवाना
'अख़्तर' को चाहने की ज़रूरत नहीं तुम्हे
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
बुधवार, 28 अगस्त 2019
ग़ज़ल : तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे
तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे
पर तू मेरा है ऐसा भी दावा न करेगे
हर बात पे मेरी खोशामाद करे जो
ऐसा सनम हम भी गवारा न करेगे
इश्क़ के बेगैर शायर पूरा न बनेगा
और इश्क़ के बेगैर हम गुज़र न करेगे
हम वो बला हैं कि तुझे भूल गए तो
ता उम्र कभी ज़िक्र तुम्हारा न करेंगे
इश्क़ ने ही अख़्तर को बर्बाद किया है
पर क्यूं कहें कि इश्क़ दोबारा न करेगे
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
सोमवार, 29 जुलाई 2019
जब गुज़र जाता हूं
मैं उसके पास से जब गुज़र जाता हूं
मैं तो नाज़ुक बदन हूं, बिखर जाता हूं
शब ओ रोज़ मैं नए सफर में निकलता हूं
जब मैं बिखर जाता हूं तब घर जाता हूं
अब उस कुच-ए-बुतखाने में ठिकाना है मेरा
जब जाहिद पूछता है तो कहता हूं कि ठहर जाता हूं
ऐसे तो उसको पाने के करता हूं फरेब
और कभी कभी इस बात से मुकर जाता हूं
ऐसे तो हिम्मत-ए-'अख़्तर' के किस्से मशहूर हैं
मगर वो सामने आता है तो डर जाता हूं
Akhtar Parwez Dehlvi
बुधवार, 3 जुलाई 2019
मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं
मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं
में बर्बाद-ए-बादशाह हुआ हूं कि क्या कहूं
मेरे कत्ल का मेरे सर पर इल्ज़ाम है
में अपना खुद-गवाह हुआ हूं कि क्या कहूं
उसको गुनहगार पसंद है उसकी नजर में मैं
इस क़दर बे-गुनाह हुआ हूं कि क्या कहूं
'अख़्तर' के क़ातिल ने 'अख़्तर' के सुनाए शेर
जो मैं वहां वाह-वाह हुआ हूं कि क्या कहूं
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
शनिवार, 15 जून 2019
ग़ज़ल : मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
ये मुझे कैसी चाहत हो गई है
वो मेरे साथ बैठी थी कल तक
ना जाने अब किस की हो गई है
मैंने बहुत अजीब ख्वाब देखा
की वो फिर से मेरी हो गई है
न जाने किस सफर में आ गया हूं
मेरी मंज़िल ही मुझसे खो गई है
उसकी आंखो में खुद को पा लिया है
मगर वो चीज क्या है जो खो गई है
ऐसे खुद पे क्यों अकड़े हो 'अख़्तर'
ज़रा सी पहचान ही तो हो गई है
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
शनिवार, 1 जून 2019
ग़ज़ल : मान ले साकी
मेरी इक बात बहर-ए-खुदा मान ले साकी
पैमाना छोड़ तू आंखों से जान ले साकी
रहूं ना होश में कुछ इसक़दर पीला दे मुझे
फिर उसके बाद मेरे दिल का बयान ले साकी
पहले अपने एब को हुनर में तब्दील कर
फिर रफ्ता-रफ्ता अपनी उड़ान ले साकी
हुआ नाकाम तो मय खाने से निकाल देना मुझे
मगर उससे पहले मेरा इम्तिहान ले साकी
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
सोमवार, 27 मई 2019
ग़ज़ल : अच्छा होता
तू सबके साथ ना चलता तो अच्छा होता
कभी खुद से भी मिलता तो अच्छा होता
मेरी तन्हाइयों को समझता तो अच्छा होता
फिर मुझे मोहब्बत करता तो अच्छा होता
मेरे सनम तूने मुझे ये क्या बना डाला है
मेरा दिल पहले सा सच्चा होता तो अच्छा होता
मेरी जुबां को क़लम से काट कर बोला
काश तू झूठ ही कहता तो अच्छा होता
तू इतना परेशान है सदाक़त पसंद लगता है
वरना तेरा भी शहर में घर तो अच्छा होता
कल तुमने जो मुझे से बात कही थी 'अख़्तर'
वो बात खुद से भी कहता तो अच्छा होता
उसने सच बोलने पे पाबंदी लगा रखी है
अख़्तर तू शायर न होता तो अच्छा होता
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
शुक्रवार, 24 मई 2019
Ghazal : Mulaqat Hui
फिर तसव्वुर में उनसे आज मुलाकात हुई
मुख्तसर सी ही मगर आज उनसे बात हुई
वो भी शर्मा से गए हम भी शर्मा से गए
ऐसा ही चलता रहा और फिर सबात हुई
ख़्वाब मे भी वो रकीबों की ही बातें करता
ऐसा लगा की वो जीता और मेरी मात हुई
चाँदनी उसके तो रहती है चार-सू अक़्सर
ये भी इक अजब की हुस्न-ए-ताजरबात हुई
मुद्दतों बाद उसने खुद को फिर से पहचाना
मुद्दतों बाद जब 'अख़्तर' से मुलाकात हुई
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
मंगलवार, 21 मई 2019
Ghazal : क्या मिला आपको, उससे रुलाने से
क्या मिला आपको, उससे रुलाने से
जो हंस रहा था मेरे अफसाने से
अब तू किस किरदार में है ये बता
कल इक शख्स पूछ रहा था इक दीवाने से
वो जो ज़ख्म है दिखा नहीं सकता में
जो मुझे मिल रहे थे इक ज़माने से
इस दर्द की क्या दुआ दूं तुझे ऐ साकी
बिना पियाए ही निकाल दिया शराब-खाने से
अब कुछ चाह नहीं रही 'अख़्तर'
सब मिल गया है उससे पाने से
'अख़्तर' को बहर-ए-खुदा आजमाना छोड़
'अख़्तर' टूट जाता है जादा आजमाने से
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
सोमवार, 20 मई 2019
Ghazal : बयां कर नहीं सकता
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता
चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता
खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता
अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
रविवार, 19 मई 2019
ghazal : उसके कूचें में जो ठहरने वाला था
वो मेरा अहबाब निखारने वाला था
उसको खुद में ढूंढ रहा हूँ मुद्दत से
वो तो मुझमे एक घर करने वाला था
ज़िन्दगी ने हर मोड़ पे चोटें दी लेकिन
में भी कहाँ आसानी से बिखरने वाला था
जाने उसके इश्क़ ने क्या कमाल किया
वरना में थोड़ी सुधरने वाला था
किस्मत भी उस रस्ते पर आ कर बैठी थी
जो रास्ता में छोड़ के चलने वाला था
गोया उसको याद भी मेरी आयी कब
जब में उसके इश्क़ में मरने वाला था
इश्क़ ने तुझको तब भी घेर लिया 'अख़्तर'
तू तो उस रस्ते से,बच के निकलने वाला था
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
Ghazal: मुस्कुरा देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं
तसव्वुर में तो वो रहती है मगर न जाने
मै किसी और की तसवीर बना देता हूं
अब मुझे याद नहीं रहता कुछ उसके सिवा
न जाने किस-किस को अपने शेर सुना देता हूं
जमाल-ए-यार तो ना खुश ही नजर आता है
जब उसका नाम अपने नाम से मिला देता हूं
आंख नम है और होंठों पे तबस्सुम 'अख़्तर'
दुश्मन-ए-जां को कुछ ऐसे सज़ा देता हूं
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
शनिवार, 18 मई 2019
ग़ज़ल : बता कब तक करूं
मुंतजिर-ए-मदवा-ए-दिल-ए-बीमार बता कब तक करूं
मसीहा का इंतज़ार बता कब तक करूं
तू आज हमनशीं हुआ मुद्दातों बाद
में तेरा दीदार बता कब तक करूं
उसे पाना है तो बर्बाद होना पड़ता है
में खुद को मिस्मार बता कब तक करूं
आज खुद का ही सामना होगा मैदान में
में खुद को तैयार बता कब तक करूं
हुआ है इश्क़ मुझे ऐ बेखबर सुन ले
में इसका प्रचार बता कब तक करूं
तेरे पास तो चाहने वालों की फेहरिस्त है
में खुद को दावेदार बता कब तक करूं
कोई किरदार अख़्तर के निसिब में नहीं
मगर खुद को अदाकार बता कब तक करूं
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
गुरुवार, 16 मई 2019
Ghazal : Bimaar kar gya
आने वाली ख़ुशी से खबरदार कर गया
मुझको यार बेवजह बीमार कर गया
ले देके मेरे पास इक एब ही तो था
इसको भी हुनर करके वो बेकार कर गया
जो आईना उसकी हकीकत बताता था
वो आइने के बीच में दीवार कर गया
पाबंदी थी जिसे देखने की सारे शहर में
मैं आइने में उसका दीदार कर गया
वो बस इक ही पल ही तो गुजरा था कुचें से
जाते जाते सरी गली गुलज़ार ए महकार कर गया
'अख़्तर' तो फ़ना हो रहा था कहानी में अपने
मगर पूछने पे हंसते हंसते इनकार कर गया
उस शख्स को 'अख़्तर' से मोहब्बत तो होगी ?
ये सवाल ही 'अख़्तर' के लिए दरकार कर गया
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
मंगलवार, 7 मई 2019
Ghazal : Agar ye Ishq khasara hai
इस ख़सारा का भी हंसते हुए नज़ारा करते
हम भला किस-किस को गंवार करते
इससे बेहतर था कि खुद से किनारा करते
मुद्दत से तुमने देखा ही नहीं मेरी जानिब
तुम नज़रें मिलते हमसे तो इशारा करते
आंख खुलते ही तेरा हुस्न हम-नशीन होता
कुछ इस तरह हम ज़िन्दगी गुजरा करते
इसी इंतज़ार में बसर हुई है ज़िन्दगी मेरी
वो भी तो कभी 'अख़्तर' को पुकारा करते
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
बुधवार, 1 मई 2019
Ghazal : बर्बादी
मेरी इब्तादा थी बर्बादी मेरी इंतेहा है बर्बादी
जिससे ना मिला रहा बर्बाद, मिल गया तो बर्बादी
मेरे रास्ते तो वीरान हैं मेरे साथ क्यूं चले कोई
मेरे मंज़िल ए मुकद्दर का इक मुकद्दर है बर्बादी
तबस्सुम ए किताब को कल पढ़ा मैंने था
हर एक पन्ने पर हर एक लफ्ज़ था बर्बादी
कल एक आशिक़ को देख कर हसद में था
उसकी जैसी हालत की मेरी भी कर बर्बादी
इतनी खुशी में तो जी नहीं सकता मैैं
'अख़्तर' को तबस्सुम में छोड़ ना तू बर्बादी
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
सोमवार, 29 अप्रैल 2019
नज़्म: तू इतनी खूबसूरत क्यों है
तू इतनी खूबसूरत क्यूं है
तेरी आंखों में केहकेशां छुपे रहते हैं
हम तो बस तेरी आंखों को देखा करते हैं
तेरी आंखों में खुद को ढूंढा करते हैं
उन आंखों में ये तोहमत क्यूं है
तू इतनी खूबसूरत क्यूं है
ख़्वाब तेरे कभी आए तो क्या बात बने
नींद तू भी तो उड़ाए तो क्या बात बने
चांद तुझसे रूठ जाए तो क्या बात बने
अगर ये आफ़त है तो आफ़त क्यूं है
तू इतनी खूबसूरत क्यूं है
शब में तेरी है सदा सुनाई देती है
आंखें जब बंद करें तू ही दिखाई देती है
और फिर आवाज़ दे के तू जगा देती है
अगर ये ज़हमत है तो ज़हमत क्यूं है
तू इतनी खूबसूरत क्यूं है
फूल भी तुझ को देख कर मुरझातें हैं
घटाएं तेरे गेसुओं से प्यास बुझातें हैं
चमन दूर से तुझे देखे कर शरमातें हैं
और तुझे इस बात से हैरत क्यूं है
तू इतनी खूबसूरत क्यूं है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
रविवार, 21 अप्रैल 2019
ग़ज़ल : अब तो हिज्र में कोई अश्क-फिशानी ही नहीं
जो वीरानी थी पहले वो वीरानी ही नहीं
अब तुझे छोड़ना ही है तो छोड़ दे मुझको
बात जब इतनी ही बिगड़ी है तो बनानी ही नहीं
अब तो किरदार भी मिल नहीं रहे हैं मुझे
लगता है उसके पास अब कोई कहानी ही नहीं
बात जो मैंने कही थी वही हक़ीक़त थी
बात वो उसने कभी मेरी मानी ही नहीं
उसकी नाकामियों पे यूँ न हसं तू अख़्तर
दश्त की खाक तूने अभी छानी ही नहीं
Akhtar Parwez Dehlvi
Ghazal
mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya ...
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हम तुम को इस क़दर देखें तुम्हारे लब पे चश्म-तर देखें ये तेरे शबनम ओ शबाब को सारे दुनिया के सुखनवर देखें तेरी चाहत को तेरी यादों को हम ...
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आज की रात कुछ और नज़ारे निकले जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले खो ...