शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

Ghazal : diya mujh ko

मेरे हुनर ने आखिर क्या दिया मुझ को
बस ज़िन्दगी का बंदी बना दिया मुझ को

वो कोन था जो नींद ले उड़ा मेरा 
वो कोन है जिसने सुला दिया मुझ को

तुझे तो शर्मसार हो के मारना है 
इक फूल ने मर के बता दिया मुझ को

ये औरतों पे जुर्म ईमान बेच कर करता है
ऐ मर्द तूने तो शर्म से झुका दिया मुझ को

दो-चार बार हिजरत का करके तकिया-कलाम
वो सोचता है कि उसने डरा दिया मुझ को 

इस तरह तो 'अख़्तर' भी नहीं जाने वाला 
तेरे सितम ने पत्थर बना दिया मुझ को 

~Akhtar Parwez Dehlvi

रविवार, 1 दिसंबर 2019

Ghazal

इक बार मुझ पर भी यकीन कर के देख
और मेरे सारे हुनर फ़ित्नागर के देख 

रोया हूं इस कद्र मगर तुझको यकीं नहीं 
ऐसा कर ज़ालिम मेरे जिस्म में उतर के देख

तन्हा नहीं हूं गुफ्तगू होती है ख़ुद से रोज़
इक बार ख़ुद को भी तू हैरान कर के देख

इक रोशनी के वास्ते शहर को जला दिया 
आ जा मेरे शहर में तू जलवे हुनर के देख

नाखुदा अगर तुझे साहिल की चाह है 
तो ऐसे कर कश्ती को भंवर में कर के देख

तुझको भी रास आयेगी दुनिया-ए-रंज-ओ-गम
इक बार उसकी आंख के पैकर से उभर के देख

'अख़्तर' को भी नसीब हो जाए तेरी हुस्न ओ नज़ाकतें
दो चार दिन ज़ालिम 'अख़्तर' के घर में ठहर के देख

~Akhtar Parwez Dehlvi
फ़ित्नागर - mischievous
नाखुदा - Sailor

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

Ghazal

हश्र के दिन फिर तुझे भी आजमाया जाएगा 
और फिर आवाज़ दे के तुझे बुलाया जाएगा

मेरे खातिर तूने जो अश्क बहाए थे कभी
ये मेरा क़र्ज़ है मेरे खुं से चुकाया जाएगा 

अब मैं शर्मिंदा शर्मिंदा शर्मिंदा हूं
ऐसा मंजर देख कर बस मातम मनाया जाएगा

अब न बोला तू तो मर जाएगा अंदर से 'अख़्तर'
और अगर बोला तो सुली पर चढ़ाया जाएगा 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

रविवार, 24 नवंबर 2019

Ghazal : mera hai

ज़ालिम ने इस सलीके से काटी थी ये ज़ुबां
गर जो मैं बोल पड़ा हूं ये हुनर मेरा है 

बस वीरानियां ही इसमें रश्क करती है 
अब ये जैसा भी है ख्वाब नगर मेरा है 

मेरी नाकामी का इससे बड़ा सबूत क्या होगा
की मैं जिसपे हसंता हूं वो बर्बाद शहर मेरा है 

तू जिस दिल से राक़ीबों से मिला करता है
तेरे दिल में वो ख्वाबीदा-शरार मेरा है 

वो शब-ओ-रोज़ मुझे खुद से जुदा करता है 
और रोज़ दावा ये करता है कि 'अख़्तर' मेरा है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

ग़ज़ल : ख़त्म हो गई

ऐलान हुआ है कि बेकारी ख़त्म हो गई
एक दो नहीं सारी की सारी ख़त्म ही गई

चार गूंगे इस तरफ चिल्ला रहे हक बोलिए 
और बहरा-शहर की बीमारी ख़त्म हो गई

वो पेहन के ताज बैठा है लाशों के ढेर पर
ऐसा लगता है उसकी ख़ूँ-ख़्वारी ख़त्म ही गई

ज़ुल्म-सितम से डर कर गर कर दूं मैं उसको सलाम
तो समझ लेना की मेरी ख़ुद-दारी ख़त्म हो गई

रातों-रात शहर के सारे खजाने लूट गए
लगता है शहर की पहरे दारी ख़त्म हो गई

मैंने भी दो चार पत्थर फेंक के मारे 'अख़्तर'
और उसकी सारी शीशा-कारी ख़त्म हो गई

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 20 नवंबर 2019

ग़ज़ल : होना है

क्या तुझे वाह वाह होना है
मेरा होना ख़्वा-मख़्वाह होना है

बर्बाद तो कर लिया खुद को 
अब तो बस तबाह होना है

ख्वाहिश सब मेरी बेकार हैं
कि मुझे ख़ानक़ाह होना है 

डर मेरे दिल में जाकर बैठ गया
अब मुझ से गुनाह होना है

तुझ से मेरा कोई तालुक नहीं
हम तुम में निकाह होना है

अहल-ए-शहर की नजर में
ये रिश्ता मुबाह होना है
 
अख़्तर को अपने ही क़त्ल का 
ख़ुद-बा-ख़ुद गवाह होना है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ghazal : Kyun nahi hai

ग़म गर दरिया है तो उसका किनारा क्यूं नहीं है 
लब-ए-सनम पर ज़िक्र हमारा क्यूं नहीं है

मेरी सद-हजारां कोशिशों के बावजूद
मेरा हुनर आख़िर मुझ से हारा क्यूं नहीं है 

मेरी तनहाई तू मुझे मारने वाली है क्या 
गर ये सच है तो अब तक मारा क्यूं नहीं है 

मैं आज फिर उदास हो गया ये सोच के 
कि मेरे ऐब ने मुझ को निखारा क्यूं नहीं है 

अब हर बात पर चुप-चाप ही तो रहता हूं
मगर ये बात अब तुझको गवारा क्यूं नहीं है

ऐसा नहीं की 'अख़्तर' रोता ही नहीं है 
फिर अश्कों ने मुझे अबतक संवारा क्यूं नहीं है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शनिवार, 16 नवंबर 2019

ग़ज़ल : मैं अपनी ख्वाहिशों को संग-सार कर दूंगा

मैं अपनी ख्वाहिशों को संग-सार कर दूंगा
वो मिलेगा भी तो अब नागवारकर दूंगा 

तस्व्वर में इक अक्स ढूंढ़ कर उसका 
अपने लहू से उसको बहार कर दूंगा 

मैैं वो ख़ुद गरज़ हूं कि अपनी खुशी के लिए 
तमाम शहर के मौसम, क़र्ज़-दार कर दूंगा 

मेरे रकीब भी बोसे के लिए तड़पेंगे 
की उसके लब चूम के आब-ए-शराब कर दूंगा

मुझे अब किसी से कोई रंज ही नहीं 'अख़्तर'
मैं अबकी बार अपना जिस्म उधार कर दूंगा 

~Akhtar Parwez Dehlvi

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

Ghazal : Batane Wala

mein nakamiyon ko apna batane wala 
kabhi kabhi tu khud se ghabrane wala 

tum kyun takaluf karte ho hasne ki mujhe 
ik mera dard hi hai mujhko hasane wala 

Aao main tumhe ek raaz bataun 'Akhtar'
ki gam-e-zeest hi hai sath nibhane wala 

bas tabassum ke sahare toh ji nahi sakta
mujhe gam chahiye ik umr bitane wala 

mein bas ik sakun bhari nind sona chahata hun
khin mujhe jaga na de harsh barpaane wala

mai-kade ka pata zahidon ko kya maloom
ye bas bataega tabiyat se ladkhadane wala 

'akhtar' teri akhon me ik bechaini nazar aati hai
tujhe maar gaya kya tujhe bachane wala

~Akhtar Parwez Dehlvi

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

हो नहीं सकता

तू कोन है ये बात मुझे पहले ही बताता 
ऐसे तो तेरे साथ निभा हो नहीं सकता 

ज़ख्मों को लिए घुमा हूं मैं तो तमाम उम्र
ये रंग-ए-लहू है हिना हो नहीं सकता 

एक उम्र मैं खुद के साये से लड़ा हूं 
मैं चाहूं भी तो खुद से जुदा हो नहीं सकता 

हंसता हूं अपनी हालत पर करता हूं न कोई काम 
मैं क्या करूं मैं इससे बुरा हो नहीं सकता 

उसने मुझे कैद ही करने से किया इनकार 
इक मैं हूं चाह कर भी रिहा हो नहीं सकता

गिरता है जबीं सजदे को और दिल नहीं झुकता 
'अख़्तर' ऐसे तेरा नमाज़ अदा हो नहीं सकता 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

ग़ज़ल : ढूंढ़ता रहा

मैं अपनी दुआओं में असर ढूंढता रहा
उसमे छुपा जो ज़र था वो ज़र ढूंढ़ता रहा 

नाकामियों में मैं ने गुजारी है ज़िन्दगी 
नाकामियों में अपना हुनर ढूंढता रहा

ज़ालिम ने मेरा क़त्ल सारे आम कर दिया 
और मैं अपनी मौत की खबर ढूंढता रहा 

वैसे तो आए थे सभी मेरे मज़ार पर 
लेकिन मैं उस कातिल की नज़र ढूंढता रहा 

हुस्न-औ-जमाल-ए-यार ने नज़ाकत-अदा के साथ
मारे कि तीर ऐसे की जिगर ढूंढता रहा 

मैं उसको देखता रहा 'अख़्तर' तमाम रात 
बेचारा क़मर, रश्क-ए-क़मर ढूंढता रहा 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

रश्क ए क़मर - envy of moon
ज़र - money 

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : रोज़ करता है

वो अपने ख्वाब को पैरों से रौंदा रोज़ करता है
इसलिए ही तो आइने से पर्दा रोज़ करता है

न जाने किसने कह दिया उससे उदासी तलाश कर
इसलिए ही वो बज़्मो में भटका रोज़ करता है

नहीं मुझको पसंद ख्वाहिश ए दिल की परस्ती अब
मगर ये दिल ख्वाहिश ए दीदार पैदा रोज़ करता है

वो ज़ालिम है ज़ुल्म ओ सितम काम है उसका
मगर इक ज़ुल्म कर ज़ालिम भी तड़पा रोज़ करता है

नहीं बस में उसके इक छाले का मदवा भी
मगर चारागर भी ईसा का दावा रोज़ करता है

नहीं है वस्ल ए उम्मीद अपने यार से लेकिन
ये कम है कि वो खिड़की से झांका रोज़ करता है

ये अख़्तर किस तरह की वाबस्तगी हुनर से तेरी
तू पहले ज़ख्म देता है और अच्छा रोज़ करता है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी


रविवार, 20 अक्टूबर 2019

नज़्म: ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने हैं ये भी तो इक अफ़त है 

ये तेरी झुकी नज़रें मुझ को तो सताती है 
आखों की रनाई भी इक हश्र बरपाती है 
मेरी परेशान आंखे इक अक्स बनाती है 
फिर तेरी तबस्सुम मुझ को बताती है 
की ये हुस्न ए इबादत है ये हुस्न ए इबादत है 

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है 

अगर ये पूछ लूं मैं तुझसे नाराज़ तू न होना 
नज़रें झुका कर आखिर तू किसको सोचती है 
मैं तो हूं तेरे जानिब मैं तो हूं तुझ से वाकिफ 
क्या तू मुझको सोचती है क्या तू मुझको सोचती है 
में जान गया तुझको पहचान गया तुझको 
की ये तेरी रिवायत है ये तेरी रिवायत है 

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है 

~ अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : तुझे हम इस क़दर देखें

हम तुम को इस क़दर देखें 
तुम्हारे लब पे चश्म-तर देखें

ये तेरे शबनम ओ शबाब को
सारे दुनिया के सुखनवर देखें

तेरी चाहत को तेरी यादों को
हम देखें भी तो मुंतजर देखें

तेरे जिस्म-ए-मुनाव्वर को
चांदनी रातों में क़मर देखें

उसे किसी और का शेर पसंद आया है
हम अपनी ग़ज़लों को बे-असर देखें

इक ये बीमार-ए-इश्क़-ओ-मिजाज़
सारे दुनिया के चरागर देखें

'अख़्तर' तो अपने ख्वाबों में
बस तुम को देखे बेशतर देखे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : अच्छा नहीं करते


अच्छा है की तुम मुझको अच्छा नहीं करते
और मुझको बुरा कहते हो अच्छा नहीं करते

करते हो हम पर रोज़ नया इक सितम ग़ज़ब
और हमारे ज़ख्म भरते हो अच्छा नहीं करते

बढ़ते हो दिलों के फासले, जंग भी लगते हो
और अमन की बात करते हो अच्छा नहीं करते

मैं हूं बीमार-ए-इश्क मुझे बीमार रहने दो
इलाज-ए-इश्क करते हो अच्छा नहीं करते

'अख्तर' को चाहिए भी क्या बस इक सुकून-ए-दिल
और इससे तुम जुर्म कहते हो अच्छा नहीं करते

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल: मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने

मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने
और मुझको इक घूंट न पिलाई लोगों ने

मैं तो उसके रूह का इक कैदी था
और मुझको दी है रिहाई लोगों ने

शाम सवेरे उसको मेरी याद आए
ऐसी मेरी की है बुराई लोगों ने

दिनभर दौड़ता रहता हूं जिस कागज़ पर
उस कागज़ में आग लगाई लोगों ने

वो ग़ज़ल थी मेरी और तू शायर था
'अख़्तर' को ये बात बताई लोगों ने

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे

मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे
लगता है शायरों की आदत नहीं तुम्हे

वो ग़ज़ल कहे बस गज़ल कहे और मुझ पर कहे
क्या ऐसी वैसी कोई भी हसरत नहीं तुम्हे ?

इक मुद्दत से खुद को मैं दुनिया से छिपा कर
बस तुमको चाहता हूं की हैरत नहीं तुम्हे

मैं हूं अपने अंदाज़ का अकेला दीवाना
'अख़्तर' को चाहने की ज़रूरत नहीं तुम्हे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 28 अगस्त 2019

ग़ज़ल : तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे

तुझसे हम ऐसे तो किनारा न करेगे
पर तू मेरा है ऐसा भी दावा न करेगे

हर बात पे मेरी खोशामाद करे जो
ऐसा सनम हम भी गवारा न करेगे

इश्क़ के बेगैर शायर पूरा न बनेगा
और इश्क़ के बेगैर हम गुज़र न करेगे

हम वो बला हैं कि तुझे भूल गए तो
ता उम्र कभी ज़िक्र तुम्हारा न करेंगे

इश्क़ ने ही अख़्तर को बर्बाद किया है 
पर क्यूं कहें कि इश्क़ दोबारा न करेगे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 29 जुलाई 2019

जब गुज़र जाता हूं

मैं उसके पास से जब गुज़र जाता हूं
मैं तो नाज़ुक बदन हूं, बिखर जाता हूं

शब ओ रोज़ मैं नए सफर में निकलता हूं
जब मैं बिखर जाता हूं तब घर जाता हूं

अब उस कुच-ए-बुतखाने में ठिकाना है मेरा
जब जाहिद पूछता है तो कहता हूं कि ठहर जाता हूं

ऐसे तो उसको पाने के करता हूं फरेब
और कभी कभी इस बात से मुकर जाता हूं

ऐसे तो हिम्मत-ए-'अख़्तर' के किस्से मशहूर हैं
मगर वो सामने आता है तो डर जाता हूं

Akhtar Parwez Dehlvi

बुधवार, 3 जुलाई 2019

मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं

मैं इस क़दर तबाह हुआ हूं कि क्या कहूं
में बर्बाद-ए-बादशाह हुआ हूं कि क्या कहूं

मेरे कत्ल का मेरे सर पर इल्ज़ाम है
में अपना खुद-गवाह हुआ हूं कि क्या कहूं

उसको गुनहगार पसंद है उसकी नजर में मैं
इस क़दर बे-गुनाह हुआ हूं कि क्या कहूं

'अख़्तर' के क़ातिल ने 'अख़्तर' के सुनाए शेर
जो मैं वहां वाह-वाह हुआ हूं कि क्या कहूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 15 जून 2019

ग़ज़ल : मुझे उससे मोहब्बत हो गई है

मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
ये मुझे कैसी चाहत हो गई है

वो मेरे साथ बैठी थी कल तक
ना जाने अब किस की हो गई है

मैंने बहुत अजीब ख्वाब देखा
की वो फिर से मेरी हो गई है

न जाने किस सफर में आ गया हूं
मेरी मंज़िल ही मुझसे खो गई है

उसकी आंखो में खुद को पा लिया है
मगर वो चीज क्या है जो खो गई है

ऐसे खुद पे क्यों अकड़े हो 'अख़्तर'
ज़रा सी पहचान ही तो हो गई है

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 1 जून 2019

ग़ज़ल : मान ले साकी

मेरी इक बात बहर-ए-खुदा मान ले साकी
पैमाना छोड़ तू आंखों से जान ले साकी

रहूं ना होश में कुछ इसक़दर पीला दे मुझे
फिर उसके बाद मेरे दिल का बयान ले साकी

पहले अपने एब को हुनर में तब्दील कर
फिर रफ्ता-रफ्ता अपनी उड़ान ले साकी

हुआ नाकाम तो मय खाने से निकाल देना मुझे
मगर उससे पहले मेरा इम्तिहान ले साकी

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 27 मई 2019

ग़ज़ल : अच्छा होता

तू सबके साथ ना चलता तो अच्छा होता
कभी खुद से भी मिलता तो अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों को समझता तो अच्छा होता
फिर मुझे मोहब्बत करता तो अच्छा होता

मेरे सनम तूने मुझे ये क्या बना डाला है
मेरा दिल पहले सा सच्चा होता तो अच्छा होता

मेरी जुबां को क़लम से काट कर बोला
काश तू झूठ ही कहता तो अच्छा होता

तू इतना परेशान है सदाक़त पसंद लगता है
वरना तेरा भी शहर में घर तो अच्छा होता

कल तुमने जो मुझे से बात कही थी 'अख़्तर'
वो बात खुद से भी कहता तो अच्छा होता 

उसने सच बोलने पे पाबंदी लगा रखी है
अख़्तर तू शायर न होता तो अच्छा होता

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शुक्रवार, 24 मई 2019

Ghazal : Mulaqat Hui

फिर तसव्वुर में उनसे आज मुलाकात  हुई
मुख्तसर सी ही मगर आज उनसे बात हुई

वो भी शर्मा से गए हम भी शर्मा से गए
ऐसा ही चलता रहा और फिर सबात हुई

ख़्वाब मे भी वो रकीबों की ही बातें करता
ऐसा लगा की वो जीता और मेरी मात हुई

चाँदनी उसके तो रहती है चार-सू अक़्सर
ये भी इक अजब की हुस्न-ए-ताजरबात हुई

मुद्दतों बाद उसने खुद को फिर से पहचाना
मुद्दतों बाद जब 'अख़्तर' से मुलाकात हुई

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

मंगलवार, 21 मई 2019

Ghazal : क्या मिला आपको, उससे रुलाने से

क्या मिला आपको, उससे रुलाने से
जो हंस रहा था मेरे अफसाने से

अब तू किस किरदार में है ये बता
कल इक शख्स पूछ रहा था इक दीवाने से

वो जो ज़ख्म है दिखा नहीं सकता में
जो मुझे मिल रहे थे इक ज़माने से

इस दर्द की क्या दुआ दूं तुझे ऐ साकी
बिना पियाए ही निकाल दिया शराब-खाने से

अब कुछ चाह नहीं रही 'अख़्तर'
सब मिल गया है उससे पाने से

'अख़्तर' को बहर-ए-खुदा आजमाना छोड़
'अख़्तर' टूट जाता है जादा आजमाने से

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 20 मई 2019

Ghazal : बयां कर नहीं सकता

ऐ ज़िन्दगी तुझे अल्फ़ाज़ों में बयां कर नहीं सकता 
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता 

चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ 
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता 

खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है 
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता 

अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ 
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता 

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

रविवार, 19 मई 2019

ghazal : उसके कूचें में जो ठहरने वाला था

उसके कूचें में जो ठहरने वाला था
वो मेरा अहबाब निखारने वाला था

उसको खुद में ढूंढ रहा हूँ मुद्दत से
वो तो मुझमे एक घर करने वाला था

ज़िन्दगी ने हर मोड़ पे चोटें दी लेकिन
में भी कहाँ आसानी से बिखरने वाला था

जाने उसके इश्क़ ने क्या कमाल किया
वरना में थोड़ी सुधरने वाला था

किस्मत भी उस रस्ते पर आ कर बैठी थी
जो रास्ता में छोड़ के चलने वाला था

गोया उसको याद भी मेरी आयी कब
जब में उसके इश्क़ में मरने वाला था

इश्क़ ने तुझको तब भी घेर लिया 'अख़्तर'
तू तो उस रस्ते से,बच के निकलने वाला था

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

Ghazal: मुस्कुरा देता हूं

अब तो हालातों पे में मुस्कुरा देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं

तसव्वुर में तो वो रहती है मगर न जाने 
मै किसी और की तसवीर बना देता हूं

अब मुझे याद नहीं रहता कुछ उसके सिवा
न जाने किस-किस को अपने शेर सुना देता हूं

जमाल-ए-यार तो ना खुश ही नजर आता है
जब उसका नाम अपने नाम से मिला देता हूं

आंख नम है और होंठों पे तबस्सुम 'अख़्तर'
दुश्मन-ए-जां को कुछ ऐसे सज़ा देता हूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 18 मई 2019

ग़ज़ल : बता कब तक करूं

मुंतजिर-ए-मदवा-ए-दिल-ए-बीमार बता कब तक करूं
मसीहा का इंतज़ार बता कब तक करूं

तू आज हमनशीं हुआ मुद्दातों बाद
में तेरा दीदार बता कब तक करूं

उसे पाना है तो बर्बाद होना पड़ता है
में खुद को मिस्मार बता कब तक करूं

आज खुद का ही सामना होगा मैदान में
में खुद को तैयार बता कब तक करूं

हुआ है इश्क़ मुझे ऐ बेखबर सुन ले
में इसका प्रचार बता कब तक करूं

तेरे पास तो चाहने वालों की फेहरिस्त है
में खुद को दावेदार बता कब तक करूं

कोई किरदार अख़्तर के निसिब में नहीं
मगर खुद को अदाकार बता कब तक करूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

गुरुवार, 16 मई 2019

Ghazal : Bimaar kar gya

आने वाली ख़ुशी से खबरदार कर गया
मुझको यार बेवजह बीमार कर गया

ले देके मेरे पास इक एब ही तो था
इसको भी हुनर करके वो बेकार कर गया

जो आईना उसकी हकीकत बताता था
वो आइने के बीच में दीवार कर गया

पाबंदी थी जिसे देखने की सारे शहर में
मैं आइने में उसका दीदार कर गया

वो बस इक ही पल ही तो गुजरा था कुचें से
जाते जाते सरी गली गुलज़ार ए महकार कर गया

'अख़्तर' तो फ़ना हो रहा था कहानी में अपने
मगर पूछने पे हंसते हंसते इनकार कर गया

उस शख्स को 'अख़्तर' से मोहब्बत तो होगी ?
ये सवाल ही 'अख़्तर' के लिए दरकार कर गया

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

मंगलवार, 7 मई 2019

Ghazal : Agar ye Ishq khasara hai

अगर ये इश्क़ ख़सारा है तो ख़सारा करते
इस ख़सारा का भी हंसते हुए नज़ारा करते

हम भला किस-किस को गंवार करते
इससे बेहतर था कि खुद से किनारा करते

मुद्दत से तुमने देखा ही नहीं मेरी जानिब
तुम नज़रें मिलते हमसे तो इशारा करते

आंख खुलते ही तेरा हुस्न हम-नशीन होता
कुछ इस तरह हम ज़िन्दगी गुजरा करते

इसी इंतज़ार में बसर हुई है ज़िन्दगी मेरी
वो भी तो कभी 'अख़्तर' को पुकारा करते

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

बुधवार, 1 मई 2019

Ghazal : बर्बादी

मेरी इब्तादा थी बर्बादी मेरी इंतेहा है बर्बादी
जिससे ना मिला रहा बर्बाद, मिल गया तो बर्बादी

मेरे रास्ते तो वीरान हैं मेरे साथ क्यूं चले कोई
मेरे मंज़िल ए मुकद्दर का इक मुकद्दर है बर्बादी

तबस्सुम ए किताब को कल पढ़ा मैंने था
हर एक पन्ने पर हर एक लफ्ज़ था बर्बादी

कल एक आशिक़ को देख कर हसद में था
उसकी जैसी हालत की मेरी भी कर बर्बादी

इतनी खुशी में तो जी नहीं सकता मैैं
'अख़्तर' को तबस्सुम में छोड़ ना तू बर्बादी

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

नज़्म: तू इतनी खूबसूरत क्यों है

तू इतनी खूबसूरत क्यूं है


तेरी आंखों में केहकेशां छुपे रहते हैं

हम तो बस तेरी आंखों को देखा करते हैं

तेरी आंखों में खुद को ढूंढा करते हैं  

उन आंखों में ये तोहमत क्यूं है

तू इतनी खूबसूरत क्यूं है


ख़्वाब तेरे कभी आए तो क्या बात बने 

नींद तू भी तो उड़ाए तो क्या बात बने 

चांद तुझसे रूठ जाए तो क्या बात बने

अगर ये आफ़त है तो आफ़त क्यूं है

तू इतनी खूबसूरत क्यूं है


शब में तेरी है सदा सुनाई देती है

आंखें जब बंद करें तू ही दिखाई देती है

और फिर आवाज़ दे के तू जगा देती है 

अगर ये ज़हमत है तो ज़हमत क्यूं है

तू इतनी खूबसूरत क्यूं है


फूल भी तुझ को देख कर मुरझातें हैं 

घटाएं तेरे गेसुओं से प्यास बुझातें हैं

चमन दूर से तुझे देखे कर शरमातें हैं

और तुझे इस बात से हैरत क्यूं है 

तू इतनी खूबसूरत क्यूं है 


~अख़्तर परवेज़ देहलवी


रविवार, 21 अप्रैल 2019

ग़ज़ल : अब तो हिज‌्र में कोई अश्क-फिशानी ही नहीं

अब तो हिज्र में कोई अश्क फ़िशानी ही नहीं
जो वीरानी थी पहले वो वीरानी ही नहीं

अब तुझे छोड़ना ही है तो छोड़ दे मुझको
बात जब इतनी ही बिगड़ी  है तो बनानी ही नहीं

अब तो किरदार भी मिल नहीं रहे हैं मुझे
लगता है उसके पास अब कोई कहानी ही नहीं

बात जो मैंने कही थी वही हक़ीक़त थी
बात वो उसने कभी मेरी मानी ही नहीं

उसकी नाकामियों पे यूँ न हसं तू अख़्तर
दश्त की खाक तूने अभी छानी ही नहीं


 Akhtar Parwez Dehlvi



Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...