क्या तुझे वाह वाह होना है
मेरा होना ख़्वा-मख़्वाह होना है
बर्बाद तो कर लिया खुद को
अब तो बस तबाह होना है
ख्वाहिश सब मेरी बेकार हैं
कि मुझे ख़ानक़ाह होना है
डर मेरे दिल में जाकर बैठ गया
अब मुझ से गुनाह होना है
तुझ से मेरा कोई तालुक नहीं
हम तुम में निकाह होना है
अहल-ए-शहर की नजर में
ये रिश्ता मुबाह होना है
अख़्तर को अपने ही क़त्ल का
ख़ुद-बा-ख़ुद गवाह होना है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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