किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम
फिर क्यूं अपने आप कि सुनते नहीं हम
न जाने कोन सा जादू किया है
की अपने जिस्म में होते नहीं हम
वो तेरा ग़म यह तक खींच लाया
वगर्ना यूं कभी हंसते नहीं हम
हमारे आंसुओं पे तंज़ करके
वो कहता है कि अब रोते नहीं हम
बहुत ख़ुश मिज़ाजी मौसम है यारों
मगर अब रात भर सोते नहीं हम
गिला भी तुझसे क्या ऐ हम-सुख़नवर
वगर्ना शायर भी होते नहीं हम
परवेज़ अख़्तर