शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

Ghazal : diya mujh ko

मेरे हुनर ने आखिर क्या दिया मुझ को
बस ज़िन्दगी का बंदी बना दिया मुझ को

वो कोन था जो नींद ले उड़ा मेरा 
वो कोन है जिसने सुला दिया मुझ को

तुझे तो शर्मसार हो के मारना है 
इक फूल ने मर के बता दिया मुझ को

ये औरतों पे जुर्म ईमान बेच कर करता है
ऐ मर्द तूने तो शर्म से झुका दिया मुझ को

दो-चार बार हिजरत का करके तकिया-कलाम
वो सोचता है कि उसने डरा दिया मुझ को 

इस तरह तो 'अख़्तर' भी नहीं जाने वाला 
तेरे सितम ने पत्थर बना दिया मुझ को 

~Akhtar Parwez Dehlvi

रविवार, 1 दिसंबर 2019

Ghazal

इक बार मुझ पर भी यकीन कर के देख
और मेरे सारे हुनर फ़ित्नागर के देख 

रोया हूं इस कद्र मगर तुझको यकीं नहीं 
ऐसा कर ज़ालिम मेरे जिस्म में उतर के देख

तन्हा नहीं हूं गुफ्तगू होती है ख़ुद से रोज़
इक बार ख़ुद को भी तू हैरान कर के देख

इक रोशनी के वास्ते शहर को जला दिया 
आ जा मेरे शहर में तू जलवे हुनर के देख

नाखुदा अगर तुझे साहिल की चाह है 
तो ऐसे कर कश्ती को भंवर में कर के देख

तुझको भी रास आयेगी दुनिया-ए-रंज-ओ-गम
इक बार उसकी आंख के पैकर से उभर के देख

'अख़्तर' को भी नसीब हो जाए तेरी हुस्न ओ नज़ाकतें
दो चार दिन ज़ालिम 'अख़्तर' के घर में ठहर के देख

~Akhtar Parwez Dehlvi
फ़ित्नागर - mischievous
नाखुदा - Sailor

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...