हाल ए तब्बसुम पे नादामत ही किया है मैंने
ये भी सच है कि जिहालत ही किया है मैंने
कभी मिले तो रकीबों से पूछो हाल उनका
कोन कहता है बस मोहब्बत ही किया है मैंने
ये भी सच है कि बस तेरा भला चाहता हूं
ये भी सच है कि बस नफ़रत ही किया है मैंने
तुझ को छोड़ कर कभी जिस्म छोड़ कर 'अख्तर'
ज़िन्दगी भर तो बस हिजरत ही किया है मैंने
कभी पूछो की उल्फत मैं 'अख़्तर' क्या न किया
ऐसा थोड़ी है कि बस बगावत ही किया है मैंने
~अख़्तर परवेज़ देहलवी