शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

ghazal

हाल ए तब्बसुम पे नादामत ही किया है मैंने
ये भी सच है कि जिहालत ही किया है मैंने 

कभी मिले तो रकीबों से पूछो हाल उनका
कोन कहता है बस मोहब्बत ही किया है मैंने 

ये भी सच है कि बस तेरा भला चाहता हूं 
ये भी सच है कि बस नफ़रत ही किया है मैंने 

तुझ को छोड़ कर कभी जिस्म छोड़ कर 'अख्तर'
ज़िन्दगी भर तो बस हिजरत ही किया है मैंने

कभी पूछो की उल्फत मैं 'अख़्तर' क्या न किया 
ऐसा थोड़ी है कि बस बगावत ही किया है मैंने 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

Ghazal

कुछ और शेर थे पर हमने वो कहे भी नहीं 
कुछ यूं भी था कि वो शेर तुमने सुने भी नहीं 

अब हम समझे की मोहब्बत में रही न बात वो
कि तुम नाराज़ भी थे और कुछ गिले भी नहीं 

तुम्हारे होंठ कुछ आब ए बादा से लगे 
जो एक बार चख ले तो कभी छूटे भी नहीं  

वो आ तो गए थे 'अख़्तर' हमरी महफ़िल में 
मज़ा तो ये था कि वो हमसे गले लगे भी नहीं 

इस कद्र क्या नाराज़गी 'अख़्तर' से सनम
कि हम एक घर में रहे और तुम लड़े भी नहीं 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

ग़ज़ल : नज़र आते हैं

बड़े बे-कद्र बड़े बे-ज़ार नज़र आते हैं 
मय छलकाते हुए मयख्वार नज़र आते है

मैंने माना की सलीक़ा नहीं पीने का मगर 
जाम हाथों में हो तो होश्यार नज़र आते हैं 

हम कहां लिखते हैं खुद कलम ही लिखता है ग़ज़ल
और कुछ लोगों को हम फनकार नज़र आते हैं

बड़े प्यार से 'अख़्तर' कह कर पुकारा उसने
आज तो हश्र के कुछ असर नज़र आते है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

नज़्म

सुनो तुम बहुत खबसूरत हो
मुझे तुम अच्छे लगते हो

ये बात अलग है 
हम तुम में बात नहीं जादा होती 
कभी होती है 
अच्छी होती है 
सच्ची होती है 
अब जितनी होती है 
अच्छा लगता है 

ये कम है कि अब भी तुम  
मेरी बातों पर हंस देती हो
थोड़ी ही सही पर
बात मुझ से करती हो
जैसे करती हो 
हंस कर करती हो 
अच्छा लगता है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी


शनिवार, 4 अप्रैल 2020

Ghazal

कभी कभी तो लगता है उससे किनारा कर लूं
और कभी यूं भी लगता है बस गुज़ारा कर लूं

तमाम शहर को उसे देखने की चाहत है
मैं उस ग़ुलाब पे अपना ही इजारा कर लूं

वो उस चमन में रहता है अकेला तन्हा
वो ज़रा बाग़ में निकले तो नज़ारा कर लूं

अब तो तन्हाई ही रास आने लगी है 'अख़्तर'
मैं ये सोच रहा हूं अब इश्क़ दोबारा कर लूं

ताज़ा फसाने की चाहत नहीं 'अख़्तर' मुझको
कि उसी बेवफा को फिर से मैं गवारा कर लूं

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...