सुनो तुम बहुत खबसूरत हो
मुझे तुम अच्छे लगते हो
ये बात अलग है
हम तुम में बात नहीं जादा होती
कभी होती है
अच्छी होती है
सच्ची होती है
अब जितनी होती है
अच्छा लगता है
ये कम है कि अब भी तुम
मेरी बातों पर हंस देती हो
थोड़ी ही सही पर
बात मुझ से करती हो
जैसे करती हो
हंस कर करती हो
अच्छा लगता है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें