सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

ग़ज़ल

मुझे अपना सा बना दे अब मुझे अहल ए सर ए अंदाज दे
मुझे ढूंढ कर मेरे हम नाशीन मुझे इल्म ए ज़ात नवाज़ दे

मैं इस दश्त में हूं नया नया मेरे सामने अहद ए बहार है
मेरी जां निसार तमन्ना हां मुझे आ के अहल ए ईजाज़ दे

मुझे हिम्मत ओ हौसला है नहीं बस बेचैनियों का ज़ख़ीरा हूं
तू ही आ के मेरे जान ए जां इस इश्क को तू आग़ाज़ दे

मुझे अपना तो कुछ पता नहीं मुझे होश इतना तो है मगर
तेरी ख़ुश नज़र का ख़्याल है इसी ख़ुश नज़र का एज़ाज़ दे

तेरे चाहने वालों में भी एक नाम हां 'अख़्तर' का है यकीं
अगर आस है तो यक़ीन कर गर नहीं यकीं तो आवाज़ दे

परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

Ghazal

छीन गई सीरत ए मेयार इन अख़बारो से
हम वाक़िफ़ न थे इस शहर के आज़ारों से

लूट के ले गई ग़रीब के निवाले तक वो
कोई उम्मीद नहीं अहद के सरकारों से 

हां तेरे हुस्न के हक़दार यकीं कर हम हैं
हमें कोई ख़ौफ़ नहीं है तेरे परस्तारों से

आ गया इनको भी हां दर्द समझने का हुनर
अब कोई काम नहीं लेता मैं अशआरों से

लेके कासे में दो चार ख़ुदी के टुकड़े
यूंही बेकार निकल जाता हूं बाज़ारों से

ढूंढ सकते हो तो जरा ढूंढ के देखो 'अख़्तर'
आजकल रब्त मेरा है ज़रा बेज़ारों से

~परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...