बुधवार, 29 जुलाई 2020

Ghazal

आज की रात कुछ और नज़ारे निकले 
जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले

हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में
लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले

खो गया जिस्म कहीं रात के अंधेरों में
मिल गया जिस्म कोई और शरारे निकले

जागता जिस्म है सोने नहीं देता इक शब
ज़िन्दगी हम भी कुछ इस तरह गुज़रे निकले

हो गए बर्बाद किया ख़ुद को तबाह हमने भी 
तब कहीं जा के इस दिल के ख़सारे निकले

तुम जो निकल आए रात में घर से अपने
ऐसा लगता है कि बे-वक़्त सितारे निकले

अब वो मुझे देख के कुछ ऐसे मुस्कुराते हैं
वो भी चाहते हैं कि अरमान हमारे निकले

परवेज़ अख़्तर

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