मंगलवार, 23 मार्च 2021

ghazal

ये कैसे तूने शेर कहे दर्द ओ रंज पर
पढ़ते है उसे ख़ूब हंसी आए है अख़्तर

पहले सनमकदे गया फिर मयकदे गया
तू भी कहां कहां भटक जाए है अख़्तर

उसका मिजाज़ ख़ुश नुमा ज़्यादा ही हो गया
लगता है उसको दर्द मेरा भाए है अख़्तर

न तो ग़ज़ल में नाम है न ज़िक्र ही उसका
फिर भी वो मेरी बात समझ जाए है अख़्तर

परवेज़ Akhtar

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...