शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

Ghazal

हश्र के दिन फिर तुझे भी आजमाया जाएगा 
और फिर आवाज़ दे के तुझे बुलाया जाएगा

मेरे खातिर तूने जो अश्क बहाए थे कभी
ये मेरा क़र्ज़ है मेरे खुं से चुकाया जाएगा 

अब मैं शर्मिंदा शर्मिंदा शर्मिंदा हूं
ऐसा मंजर देख कर बस मातम मनाया जाएगा

अब न बोला तू तो मर जाएगा अंदर से 'अख़्तर'
और अगर बोला तो सुली पर चढ़ाया जाएगा 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

रविवार, 24 नवंबर 2019

Ghazal : mera hai

ज़ालिम ने इस सलीके से काटी थी ये ज़ुबां
गर जो मैं बोल पड़ा हूं ये हुनर मेरा है 

बस वीरानियां ही इसमें रश्क करती है 
अब ये जैसा भी है ख्वाब नगर मेरा है 

मेरी नाकामी का इससे बड़ा सबूत क्या होगा
की मैं जिसपे हसंता हूं वो बर्बाद शहर मेरा है 

तू जिस दिल से राक़ीबों से मिला करता है
तेरे दिल में वो ख्वाबीदा-शरार मेरा है 

वो शब-ओ-रोज़ मुझे खुद से जुदा करता है 
और रोज़ दावा ये करता है कि 'अख़्तर' मेरा है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

ग़ज़ल : ख़त्म हो गई

ऐलान हुआ है कि बेकारी ख़त्म हो गई
एक दो नहीं सारी की सारी ख़त्म ही गई

चार गूंगे इस तरफ चिल्ला रहे हक बोलिए 
और बहरा-शहर की बीमारी ख़त्म हो गई

वो पेहन के ताज बैठा है लाशों के ढेर पर
ऐसा लगता है उसकी ख़ूँ-ख़्वारी ख़त्म ही गई

ज़ुल्म-सितम से डर कर गर कर दूं मैं उसको सलाम
तो समझ लेना की मेरी ख़ुद-दारी ख़त्म हो गई

रातों-रात शहर के सारे खजाने लूट गए
लगता है शहर की पहरे दारी ख़त्म हो गई

मैंने भी दो चार पत्थर फेंक के मारे 'अख़्तर'
और उसकी सारी शीशा-कारी ख़त्म हो गई

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 20 नवंबर 2019

ग़ज़ल : होना है

क्या तुझे वाह वाह होना है
मेरा होना ख़्वा-मख़्वाह होना है

बर्बाद तो कर लिया खुद को 
अब तो बस तबाह होना है

ख्वाहिश सब मेरी बेकार हैं
कि मुझे ख़ानक़ाह होना है 

डर मेरे दिल में जाकर बैठ गया
अब मुझ से गुनाह होना है

तुझ से मेरा कोई तालुक नहीं
हम तुम में निकाह होना है

अहल-ए-शहर की नजर में
ये रिश्ता मुबाह होना है
 
अख़्तर को अपने ही क़त्ल का 
ख़ुद-बा-ख़ुद गवाह होना है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ghazal : Kyun nahi hai

ग़म गर दरिया है तो उसका किनारा क्यूं नहीं है 
लब-ए-सनम पर ज़िक्र हमारा क्यूं नहीं है

मेरी सद-हजारां कोशिशों के बावजूद
मेरा हुनर आख़िर मुझ से हारा क्यूं नहीं है 

मेरी तनहाई तू मुझे मारने वाली है क्या 
गर ये सच है तो अब तक मारा क्यूं नहीं है 

मैं आज फिर उदास हो गया ये सोच के 
कि मेरे ऐब ने मुझ को निखारा क्यूं नहीं है 

अब हर बात पर चुप-चाप ही तो रहता हूं
मगर ये बात अब तुझको गवारा क्यूं नहीं है

ऐसा नहीं की 'अख़्तर' रोता ही नहीं है 
फिर अश्कों ने मुझे अबतक संवारा क्यूं नहीं है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शनिवार, 16 नवंबर 2019

ग़ज़ल : मैं अपनी ख्वाहिशों को संग-सार कर दूंगा

मैं अपनी ख्वाहिशों को संग-सार कर दूंगा
वो मिलेगा भी तो अब नागवारकर दूंगा 

तस्व्वर में इक अक्स ढूंढ़ कर उसका 
अपने लहू से उसको बहार कर दूंगा 

मैैं वो ख़ुद गरज़ हूं कि अपनी खुशी के लिए 
तमाम शहर के मौसम, क़र्ज़-दार कर दूंगा 

मेरे रकीब भी बोसे के लिए तड़पेंगे 
की उसके लब चूम के आब-ए-शराब कर दूंगा

मुझे अब किसी से कोई रंज ही नहीं 'अख़्तर'
मैं अबकी बार अपना जिस्म उधार कर दूंगा 

~Akhtar Parwez Dehlvi

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

Ghazal : Batane Wala

mein nakamiyon ko apna batane wala 
kabhi kabhi tu khud se ghabrane wala 

tum kyun takaluf karte ho hasne ki mujhe 
ik mera dard hi hai mujhko hasane wala 

Aao main tumhe ek raaz bataun 'Akhtar'
ki gam-e-zeest hi hai sath nibhane wala 

bas tabassum ke sahare toh ji nahi sakta
mujhe gam chahiye ik umr bitane wala 

mein bas ik sakun bhari nind sona chahata hun
khin mujhe jaga na de harsh barpaane wala

mai-kade ka pata zahidon ko kya maloom
ye bas bataega tabiyat se ladkhadane wala 

'akhtar' teri akhon me ik bechaini nazar aati hai
tujhe maar gaya kya tujhe bachane wala

~Akhtar Parwez Dehlvi

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

हो नहीं सकता

तू कोन है ये बात मुझे पहले ही बताता 
ऐसे तो तेरे साथ निभा हो नहीं सकता 

ज़ख्मों को लिए घुमा हूं मैं तो तमाम उम्र
ये रंग-ए-लहू है हिना हो नहीं सकता 

एक उम्र मैं खुद के साये से लड़ा हूं 
मैं चाहूं भी तो खुद से जुदा हो नहीं सकता 

हंसता हूं अपनी हालत पर करता हूं न कोई काम 
मैं क्या करूं मैं इससे बुरा हो नहीं सकता 

उसने मुझे कैद ही करने से किया इनकार 
इक मैं हूं चाह कर भी रिहा हो नहीं सकता

गिरता है जबीं सजदे को और दिल नहीं झुकता 
'अख़्तर' ऐसे तेरा नमाज़ अदा हो नहीं सकता 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

ग़ज़ल : ढूंढ़ता रहा

मैं अपनी दुआओं में असर ढूंढता रहा
उसमे छुपा जो ज़र था वो ज़र ढूंढ़ता रहा 

नाकामियों में मैं ने गुजारी है ज़िन्दगी 
नाकामियों में अपना हुनर ढूंढता रहा

ज़ालिम ने मेरा क़त्ल सारे आम कर दिया 
और मैं अपनी मौत की खबर ढूंढता रहा 

वैसे तो आए थे सभी मेरे मज़ार पर 
लेकिन मैं उस कातिल की नज़र ढूंढता रहा 

हुस्न-औ-जमाल-ए-यार ने नज़ाकत-अदा के साथ
मारे कि तीर ऐसे की जिगर ढूंढता रहा 

मैं उसको देखता रहा 'अख़्तर' तमाम रात 
बेचारा क़मर, रश्क-ए-क़मर ढूंढता रहा 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

रश्क ए क़मर - envy of moon
ज़र - money 

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...