मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : रोज़ करता है

वो अपने ख्वाब को पैरों से रौंदा रोज़ करता है
इसलिए ही तो आइने से पर्दा रोज़ करता है

न जाने किसने कह दिया उससे उदासी तलाश कर
इसलिए ही वो बज़्मो में भटका रोज़ करता है

नहीं मुझको पसंद ख्वाहिश ए दिल की परस्ती अब
मगर ये दिल ख्वाहिश ए दीदार पैदा रोज़ करता है

वो ज़ालिम है ज़ुल्म ओ सितम काम है उसका
मगर इक ज़ुल्म कर ज़ालिम भी तड़पा रोज़ करता है

नहीं बस में उसके इक छाले का मदवा भी
मगर चारागर भी ईसा का दावा रोज़ करता है

नहीं है वस्ल ए उम्मीद अपने यार से लेकिन
ये कम है कि वो खिड़की से झांका रोज़ करता है

ये अख़्तर किस तरह की वाबस्तगी हुनर से तेरी
तू पहले ज़ख्म देता है और अच्छा रोज़ करता है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी


रविवार, 20 अक्टूबर 2019

नज़्म: ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने हैं ये भी तो इक अफ़त है 

ये तेरी झुकी नज़रें मुझ को तो सताती है 
आखों की रनाई भी इक हश्र बरपाती है 
मेरी परेशान आंखे इक अक्स बनाती है 
फिर तेरी तबस्सुम मुझ को बताती है 
की ये हुस्न ए इबादत है ये हुस्न ए इबादत है 

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है 

अगर ये पूछ लूं मैं तुझसे नाराज़ तू न होना 
नज़रें झुका कर आखिर तू किसको सोचती है 
मैं तो हूं तेरे जानिब मैं तो हूं तुझ से वाकिफ 
क्या तू मुझको सोचती है क्या तू मुझको सोचती है 
में जान गया तुझको पहचान गया तुझको 
की ये तेरी रिवायत है ये तेरी रिवायत है 

ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है 

~ अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : तुझे हम इस क़दर देखें

हम तुम को इस क़दर देखें 
तुम्हारे लब पे चश्म-तर देखें

ये तेरे शबनम ओ शबाब को
सारे दुनिया के सुखनवर देखें

तेरी चाहत को तेरी यादों को
हम देखें भी तो मुंतजर देखें

तेरे जिस्म-ए-मुनाव्वर को
चांदनी रातों में क़मर देखें

उसे किसी और का शेर पसंद आया है
हम अपनी ग़ज़लों को बे-असर देखें

इक ये बीमार-ए-इश्क़-ओ-मिजाज़
सारे दुनिया के चरागर देखें

'अख़्तर' तो अपने ख्वाबों में
बस तुम को देखे बेशतर देखे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : अच्छा नहीं करते


अच्छा है की तुम मुझको अच्छा नहीं करते
और मुझको बुरा कहते हो अच्छा नहीं करते

करते हो हम पर रोज़ नया इक सितम ग़ज़ब
और हमारे ज़ख्म भरते हो अच्छा नहीं करते

बढ़ते हो दिलों के फासले, जंग भी लगते हो
और अमन की बात करते हो अच्छा नहीं करते

मैं हूं बीमार-ए-इश्क मुझे बीमार रहने दो
इलाज-ए-इश्क करते हो अच्छा नहीं करते

'अख्तर' को चाहिए भी क्या बस इक सुकून-ए-दिल
और इससे तुम जुर्म कहते हो अच्छा नहीं करते

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल: मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने

मुझ से पहले शराब मंगाई लोगों ने
और मुझको इक घूंट न पिलाई लोगों ने

मैं तो उसके रूह का इक कैदी था
और मुझको दी है रिहाई लोगों ने

शाम सवेरे उसको मेरी याद आए
ऐसी मेरी की है बुराई लोगों ने

दिनभर दौड़ता रहता हूं जिस कागज़ पर
उस कागज़ में आग लगाई लोगों ने

वो ग़ज़ल थी मेरी और तू शायर था
'अख़्तर' को ये बात बताई लोगों ने

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

ग़ज़ल : मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे

मुझ से इश्क़ करने की हिकमत नहीं तुम्हे
लगता है शायरों की आदत नहीं तुम्हे

वो ग़ज़ल कहे बस गज़ल कहे और मुझ पर कहे
क्या ऐसी वैसी कोई भी हसरत नहीं तुम्हे ?

इक मुद्दत से खुद को मैं दुनिया से छिपा कर
बस तुमको चाहता हूं की हैरत नहीं तुम्हे

मैं हूं अपने अंदाज़ का अकेला दीवाना
'अख़्तर' को चाहने की ज़रूरत नहीं तुम्हे

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...