अच्छा हुआ कि कोई इशारा नहीं गया
हम को कभी हकीर कहा और कभी ज़लील
इतना करम हुआ कि गवारा नहीं गया
ये भी गिला रहा कि कहा हम को क़ैस ए यार
और हम को पत्थरों से भी मारा नहीं गया
नंगे हुए जो बेच के अपना इमां तमाम
बस उनसे अपना पैराहन उतारा नहीं गया
परवेज़ अख़्तर