बुधवार, 25 नवंबर 2020

ग़ज़ल : किया गया


आज ख़ूब अपने आप से झगड़ा किया गया
हिम्मत जो बढ़ गई थी तो ऐसा किया गया

देखा कि पहले शहर में मज़लूम कितने हैं
फिर मुझ को इंतिख़ाब कर रुस्वा किया गया

रो रो के दर्द कहने की हिम्मत नहीं रही
काग़ज़ पे लिख कर शेर तमाशा किया गया

देखा जो आज बाज़ार में गुनाह की रस्में
पहले उसे छुआ गया फिर तौबा किया गया 

ऐसे तो ख़तम हो ही जाता मरज़-ला-दवा
पहले तो अपने यार को अच्छा किया गया

सोचा कि 'अख़्तर' रोज़ ये जाता किधर को है
जगकर अपनी परछाईं का पीछा किया गया

हंसते रहा हूं शब ए फ़िराक़ ए इश्क़ में
हां ठीक है 'अख़्तर' से बस इतना किया गया

परवेज़ अख़्तर

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

ग़ज़ल : लग रही थी

अहल ए शहर की गालियां वीरान लग रही थी
अहल ए जहां भी इस पर हैरान लग रही थी

थोड़ा जो मैं था टूटा तो फिर धज्जियां उड़ा दी
ऐ ज़िन्दगी मुझे तू नादान लग रही थी

हमने भी उसके आंसू देखे ज़मीं पे बिखरे 
ये रात भी बेचारी हलकान लग रही थी 

बस देखते ही मुझ को मिलने सभी हैं आए 
इन दर्द ओ ग़म से मेरी पहचान लग रही थी

टूटे सभी हैं रिश्ते अपना जिसे बनाया 
तन्हाइयां ही अब तो इम्कान लग रही थी

हमने उस वक्त ख़ुद को, है आजमाया 'अख़्तर'
जब ज़िन्दगी हमे भी आसान लग रही थी

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 18 नवंबर 2020

ग़ज़ल

मैं तो तुम्हारे साथ चलूंगा जिस सफ़र पे जाओगे
पर साथ न लेना तुम मेरा वरना तुम पछताओगे

मैंने पहले तुमसे कहा था अब क्यूं रोते पछताते हो
साथ न छोड़ूंगा मैं तुम्हारा जब तक हार न जाओगे 

सच है ज़िंदा लोग हैं लेकिन मुर्दों जैसे रहते हैं
कोई नहीं आएगा बहर कितना शोर मचाओगे

ठीक है रोना अच्छा है पर इतना रोना ठीक नहीं
रोते रोते आंखें सूखी अब क्या लहू बहाओगे ?

तुम्हारे गेसू सावन जैसे बादल जैसी आंखें है
देख के ऐसा लगता है कि तुम बरखा बरसाओगे

देखो 'अख़्तर' बात कहूं मैं बोलना बहुत ज़रूरी है
तुम इतना जो चुप रहते हो तो कायर ही कहलाओगे

परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...