शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

ग़ज़ल : लग रही थी

अहल ए शहर की गालियां वीरान लग रही थी
अहल ए जहां भी इस पर हैरान लग रही थी

थोड़ा जो मैं था टूटा तो फिर धज्जियां उड़ा दी
ऐ ज़िन्दगी मुझे तू नादान लग रही थी

हमने भी उसके आंसू देखे ज़मीं पे बिखरे 
ये रात भी बेचारी हलकान लग रही थी 

बस देखते ही मुझ को मिलने सभी हैं आए 
इन दर्द ओ ग़म से मेरी पहचान लग रही थी

टूटे सभी हैं रिश्ते अपना जिसे बनाया 
तन्हाइयां ही अब तो इम्कान लग रही थी

हमने उस वक्त ख़ुद को, है आजमाया 'अख़्तर'
जब ज़िन्दगी हमे भी आसान लग रही थी

परवेज़ अख़्तर

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Ghazal

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