आज ख़ूब अपने आप से झगड़ा किया गया
हिम्मत जो बढ़ गई थी तो ऐसा किया गया
देखा कि पहले शहर में मज़लूम कितने हैं
फिर मुझ को इंतिख़ाब कर रुस्वा किया गया
रो रो के दर्द कहने की हिम्मत नहीं रही
काग़ज़ पे लिख कर शेर तमाशा किया गया
देखा जो आज बाज़ार में गुनाह की रस्में
पहले उसे छुआ गया फिर तौबा किया गया
ऐसे तो ख़तम हो ही जाता मरज़-ला-दवा
पहले तो अपने यार को अच्छा किया गया
सोचा कि 'अख़्तर' रोज़ ये जाता किधर को है
जगकर अपनी परछाईं का पीछा किया गया
हंसते रहा हूं शब ए फ़िराक़ ए इश्क़ में
हां ठीक है 'अख़्तर' से बस इतना किया गया
परवेज़ अख़्तर
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