शनिवार, 12 दिसंबर 2020

ग़ज़ल: क्या करोगे

यहीं मयकदा है यहीं रिंद तेरे मैं न आया तो क्या करोगे
सभी नज़र में दिल ओ घर में मुझी को पाया तो क्या करोगे

तुम मुझ से नज़रें चुरा रहे हो जवाब देते नहीं हो ख़त के
अब क़ासिद लेके सलाम आया तो क्या करोगे

मैं अपने सपनों से पस्त हूं यार कायरों में हैं नाम मेरे 
कहीं तुम्हारे नसीब में भी मैं ही आया तो क्या करोगे 

तुम इसे मोहब्बत जो कह रहे हो फ़क़त हवस है ये बदन की
तुम्हारी जिस्म कि उर्यानी का सवाल आया तो क्या करोगे

मुझे पिलाने पे हैं आमादा कुछ यार मेरे हिज्र कि ख़ातिर
और पी के मैंने जो उसका नाम गुनगुनाया तो क्या करोगे
       
इश्क़ का रास्ता बड़ा तवील है ये 'अख़्तर' होगा बात छोड़ो
मैं बुजदिली की उरूज पर हूं मैं चल न पाया तो क्या करोगे

परवेज़ अख़्तर

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Ghazal

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