वो किताब मैंने लिखी है जो
शायद थोड़ा ये कम कर दे
तेरी मुझ से बेहिसी है जो
इस किताब में तेरा ज़िक्र है
तेरे हुस्न की तहरीर है
ये किताब तेरे ही नाम है
ये तेरी ही जागीर है
इस किताब में तेरा रोना है
मगर रोने का कोई सबब नहीं
इस किताब में तेरा फ़र्द है
कि तुझे ख़ुशी की कोई तलब नहीं
फिर सोचता हूं
ये किताब कहीं तेरे क़र्ब को बढ़ा न दे
और मुझे तेरी नजरों में
और नीचे गिरा न दे
चल रहने दे
तू किताब छोड़
मैं कुछ और ही सोच लेता हूं
पर मेरे पास तो और कुछ भी नहीं
मैं अपना वक़्त तोहफ़े में देता हूं
परवेज़ अख़्तर
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