शनिवार, 12 दिसंबर 2020

ग़ज़ल: क्या करोगे

यहीं मयकदा है यहीं रिंद तेरे मैं न आया तो क्या करोगे
सभी नज़र में दिल ओ घर में मुझी को पाया तो क्या करोगे

तुम मुझ से नज़रें चुरा रहे हो जवाब देते नहीं हो ख़त के
अब क़ासिद लेके सलाम आया तो क्या करोगे

मैं अपने सपनों से पस्त हूं यार कायरों में हैं नाम मेरे 
कहीं तुम्हारे नसीब में भी मैं ही आया तो क्या करोगे 

तुम इसे मोहब्बत जो कह रहे हो फ़क़त हवस है ये बदन की
तुम्हारी जिस्म कि उर्यानी का सवाल आया तो क्या करोगे

मुझे पिलाने पे हैं आमादा कुछ यार मेरे हिज्र कि ख़ातिर
और पी के मैंने जो उसका नाम गुनगुनाया तो क्या करोगे
       
इश्क़ का रास्ता बड़ा तवील है ये 'अख़्तर' होगा बात छोड़ो
मैं बुजदिली की उरूज पर हूं मैं चल न पाया तो क्या करोगे

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 25 नवंबर 2020

ग़ज़ल : किया गया


आज ख़ूब अपने आप से झगड़ा किया गया
हिम्मत जो बढ़ गई थी तो ऐसा किया गया

देखा कि पहले शहर में मज़लूम कितने हैं
फिर मुझ को इंतिख़ाब कर रुस्वा किया गया

रो रो के दर्द कहने की हिम्मत नहीं रही
काग़ज़ पे लिख कर शेर तमाशा किया गया

देखा जो आज बाज़ार में गुनाह की रस्में
पहले उसे छुआ गया फिर तौबा किया गया 

ऐसे तो ख़तम हो ही जाता मरज़-ला-दवा
पहले तो अपने यार को अच्छा किया गया

सोचा कि 'अख़्तर' रोज़ ये जाता किधर को है
जगकर अपनी परछाईं का पीछा किया गया

हंसते रहा हूं शब ए फ़िराक़ ए इश्क़ में
हां ठीक है 'अख़्तर' से बस इतना किया गया

परवेज़ अख़्तर

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

ग़ज़ल : लग रही थी

अहल ए शहर की गालियां वीरान लग रही थी
अहल ए जहां भी इस पर हैरान लग रही थी

थोड़ा जो मैं था टूटा तो फिर धज्जियां उड़ा दी
ऐ ज़िन्दगी मुझे तू नादान लग रही थी

हमने भी उसके आंसू देखे ज़मीं पे बिखरे 
ये रात भी बेचारी हलकान लग रही थी 

बस देखते ही मुझ को मिलने सभी हैं आए 
इन दर्द ओ ग़म से मेरी पहचान लग रही थी

टूटे सभी हैं रिश्ते अपना जिसे बनाया 
तन्हाइयां ही अब तो इम्कान लग रही थी

हमने उस वक्त ख़ुद को, है आजमाया 'अख़्तर'
जब ज़िन्दगी हमे भी आसान लग रही थी

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 18 नवंबर 2020

ग़ज़ल

मैं तो तुम्हारे साथ चलूंगा जिस सफ़र पे जाओगे
पर साथ न लेना तुम मेरा वरना तुम पछताओगे

मैंने पहले तुमसे कहा था अब क्यूं रोते पछताते हो
साथ न छोड़ूंगा मैं तुम्हारा जब तक हार न जाओगे 

सच है ज़िंदा लोग हैं लेकिन मुर्दों जैसे रहते हैं
कोई नहीं आएगा बहर कितना शोर मचाओगे

ठीक है रोना अच्छा है पर इतना रोना ठीक नहीं
रोते रोते आंखें सूखी अब क्या लहू बहाओगे ?

तुम्हारे गेसू सावन जैसे बादल जैसी आंखें है
देख के ऐसा लगता है कि तुम बरखा बरसाओगे

देखो 'अख़्तर' बात कहूं मैं बोलना बहुत ज़रूरी है
तुम इतना जो चुप रहते हो तो कायर ही कहलाओगे

परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम

किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम
फिर क्यूं अपने आप कि सुनते नहीं हम

न जाने कोन सा जादू किया है 
की अपने जिस्म में होते नहीं हम 

वो तेरा ग़म यह तक खींच लाया 
वगर्ना यूं कभी हंसते नहीं हम 

हमारे आंसुओं पे तंज़ करके 
वो कहता है कि अब रोते नहीं हम

बहुत ख़ुश मिज़ाजी मौसम है यारों
मगर अब रात भर सोते नहीं हम

गिला भी तुझसे क्या ऐ हम-सुख़नवर
वगर्ना शायर भी होते नहीं हम

परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 5 अगस्त 2020

Ghazal

कहेंगे ज़ालिम को ज़ालिम, ज़रा भी कम नहीं होंगे
भले वो कुछ भी हो जाएं, कभी मोहतरम नहीं होंगे

मैं इसका ख़ुद ही शाहिद हूं तुम्हें कैसे पता होगा
तुम्हें लगता है कैसे, हंसते चेहरों को गम नहीं होंगे

मैं हंसता हूं या रोता हूं, ये काम खिलवत में होता है
अगर सर ए बाज़ार रोऊं तो, फिर वो पुर-नम नहीं होंगे

ये कैसा इश्क़ है तेरा, फ़ना होना तो लाज़िम था
जब वो मुझ को चूमेगा फिर वो हम, हम नहीं होंगे

तू मुझ को अब तो न तड़पा, करीब आजा करीब आजा
कहीं ऐसा न हो तू आए और दो अलम नहीं होंगे

'अख़्तर' में हुनर इक है वो रोता है बस रोता है
रोने का भी इक ग़म है कि वो पुर-ग़म नहीं होंगे

परवेज़ अख़्तर 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

Ghazal

आज की रात कुछ और नज़ारे निकले 
जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले

हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में
लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले

खो गया जिस्म कहीं रात के अंधेरों में
मिल गया जिस्म कोई और शरारे निकले

जागता जिस्म है सोने नहीं देता इक शब
ज़िन्दगी हम भी कुछ इस तरह गुज़रे निकले

हो गए बर्बाद किया ख़ुद को तबाह हमने भी 
तब कहीं जा के इस दिल के ख़सारे निकले

तुम जो निकल आए रात में घर से अपने
ऐसा लगता है कि बे-वक़्त सितारे निकले

अब वो मुझे देख के कुछ ऐसे मुस्कुराते हैं
वो भी चाहते हैं कि अरमान हमारे निकले

परवेज़ अख़्तर

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

Ghazal : ho sakti hai

अपनी उससे भला बात भी हो सकती है 
ये भी हो सकता है खैरात भी हो सकती है

वो दानिस्ता हमारे दस्तरस से दूर हुए
और ये इश्क़ की रिवायात भी हो सकती है 

करीब इतना न आओ मुझे डर लगता है
करीब आने से इनायात भी हो सकती है 

ये भी सच है कि वो क़िस्मत में नहीं है मेरे
ये भी सच है कि मुलाक़ात भी हो सकती है

वो अलग बात है रुकना उसे कबूल न हो
ज़िन्दगी है, मुश्किल ए हालात भी हो सकती है 

ऐसा लगता है कि उसको डर है मेरे होना का
और 'अख़्तर' ये ख़्यालात भी हो सकती है

परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 18 जुलाई 2020

ghazal

ख़बर सब कुछ है अच्छा है हमारा बेख़बर होना
यहां मंजर है मुश्किल है तुम्हारा चश्म-तर होना 

जब उन से कहता हूं तुम्हे मैं याद करता हूं
उनका हंस के ये कहना हमारा अजीब-तर होना

ये कैसा हुस्न है तेरा क़मर भी जल के मारता है 
आखिर किसको नसीब है तुम्हारा हम-सफ़र होना 

यही है सब जो करते हैं ख़ूब तन्क़ीद हमारी
किसको रास आएगा हमारा सुखनवर होना 

हुनर रखते हो ऐसा कि तुम्हें सब चाहते होंगे
ऐसे हुनर से अच्छा है हमारा बेहुनर होना 

लगे फ़िरक़ा-परस्ती में करो बदनाम 'अख़्तर' को 
अभी तुम्हें मलूम नहीं है हमारा शकेब-बर होना 

परवेज़ अख़्तर

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

नज़्म : घर जल्दी आ जाना

मुझ को ये बतलाओ 
क्या मां तुमसे कहती है ?
घर जल्दी आ जाना
घर से निकलने पर 
फ़िक्र उसको रहती है 
इसलिए वो कहती है 
घर जल्दी आ जाना

मां को एक डर है 
दुनिया के दरिंदों से 
जो मर चुके हैं अंदर से
क्या करेगी मां बोलो
मां तो मां होती है
उस को डर लगता है 
उसने दुनिया देखी है 
कैसे कुछ दरिंदे 
जिस्म नौच लेते हैं
रूह कांप जाती है 
इसलिए मां कहती है 
घर जल्दी आ जाना 

सोचो,
मां पे क्या गुजरती है 
रोज़ सोचा करती है
ये बात बस करती है 
घर जल्दी आ जाना
देर न लगना 
घर जल्दी आ जाना

परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Ghazal:

क्या मिला उसे इन आंखों को लहू कर के
वो मुझ को भूल गया मेरी आरज़ू कर के

यही एक ख़्वाहिश पर जीते रहें हम बरसों
करेगा हम से गिले हमको रु-ब-रु कर के

लब को चूम लिए और उसके बाद उसने
मुझे ही छोड़ दिया जिस्म-ए-रंग-ओ-बू कर के

मुझे पता है कि आप गैरों को कहा जाता है
मैं इंतज़ार में हूं कब बोलेगा मुझ को तू कर के 

चल 'अख़्तर' मान जा होता है ज़िन्दगी में यही
तुझे मिलेगा भी क्या उसकी जुस्तुजू कर के

परवेज़ अख़्तर

सोमवार, 25 मई 2020

नज़्म : रोना होगा

एक रोज़ रोने की ख्वाइश थी तो
मुद्दतों बाद मैं आंखों में पानी लाया
वो मंजर जो किसी और से देखे न गए 
यूं सभी मंजर की निशानी लाया

मैं अपने अश्कों से आज बहुत शर्मिंदा हूं
एक ज़माने से इन्हे कैदी बना रखा था
मैं बस झूठी ख़ुशी को अपना कहता था
और दर्द ओ ग़म को मैंने छिपा रखा था

एक चलन झूठ का ये था मैं भला क्या करता 
की मर्द रोते नहीं आंखों को बिगोते नहीं 

इसी एक झूठ ने मुझ को है बर्बाद किया 
हर एक दिन मुझे नाशाद पे नाशाद किया 

अब मुझे कुछ नहीं आता तो इतना ही सही 
फूट कर आज मुझे रोना होगा 
जो लगे दाग़ हैं ऐसे तो धुल नहीं सकते 
मुझे अपने लहू से इन्हे धोना होगा

अब इस झूठ को दुनिया से ही जाना होगा
'अख़्तर' तुझे पहले रो के दिखाना होगा 

परवेज़ अख़्तर

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

ghazal

हाल ए तब्बसुम पे नादामत ही किया है मैंने
ये भी सच है कि जिहालत ही किया है मैंने 

कभी मिले तो रकीबों से पूछो हाल उनका
कोन कहता है बस मोहब्बत ही किया है मैंने 

ये भी सच है कि बस तेरा भला चाहता हूं 
ये भी सच है कि बस नफ़रत ही किया है मैंने 

तुझ को छोड़ कर कभी जिस्म छोड़ कर 'अख्तर'
ज़िन्दगी भर तो बस हिजरत ही किया है मैंने

कभी पूछो की उल्फत मैं 'अख़्तर' क्या न किया 
ऐसा थोड़ी है कि बस बगावत ही किया है मैंने 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

Ghazal

कुछ और शेर थे पर हमने वो कहे भी नहीं 
कुछ यूं भी था कि वो शेर तुमने सुने भी नहीं 

अब हम समझे की मोहब्बत में रही न बात वो
कि तुम नाराज़ भी थे और कुछ गिले भी नहीं 

तुम्हारे होंठ कुछ आब ए बादा से लगे 
जो एक बार चख ले तो कभी छूटे भी नहीं  

वो आ तो गए थे 'अख़्तर' हमरी महफ़िल में 
मज़ा तो ये था कि वो हमसे गले लगे भी नहीं 

इस कद्र क्या नाराज़गी 'अख़्तर' से सनम
कि हम एक घर में रहे और तुम लड़े भी नहीं 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

ग़ज़ल : नज़र आते हैं

बड़े बे-कद्र बड़े बे-ज़ार नज़र आते हैं 
मय छलकाते हुए मयख्वार नज़र आते है

मैंने माना की सलीक़ा नहीं पीने का मगर 
जाम हाथों में हो तो होश्यार नज़र आते हैं 

हम कहां लिखते हैं खुद कलम ही लिखता है ग़ज़ल
और कुछ लोगों को हम फनकार नज़र आते हैं

बड़े प्यार से 'अख़्तर' कह कर पुकारा उसने
आज तो हश्र के कुछ असर नज़र आते है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

नज़्म

सुनो तुम बहुत खबसूरत हो
मुझे तुम अच्छे लगते हो

ये बात अलग है 
हम तुम में बात नहीं जादा होती 
कभी होती है 
अच्छी होती है 
सच्ची होती है 
अब जितनी होती है 
अच्छा लगता है 

ये कम है कि अब भी तुम  
मेरी बातों पर हंस देती हो
थोड़ी ही सही पर
बात मुझ से करती हो
जैसे करती हो 
हंस कर करती हो 
अच्छा लगता है 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी


शनिवार, 4 अप्रैल 2020

Ghazal

कभी कभी तो लगता है उससे किनारा कर लूं
और कभी यूं भी लगता है बस गुज़ारा कर लूं

तमाम शहर को उसे देखने की चाहत है
मैं उस ग़ुलाब पे अपना ही इजारा कर लूं

वो उस चमन में रहता है अकेला तन्हा
वो ज़रा बाग़ में निकले तो नज़ारा कर लूं

अब तो तन्हाई ही रास आने लगी है 'अख़्तर'
मैं ये सोच रहा हूं अब इश्क़ दोबारा कर लूं

ताज़ा फसाने की चाहत नहीं 'अख़्तर' मुझको
कि उसी बेवफा को फिर से मैं गवारा कर लूं

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

ghazal

अभी तू मुझको अपने दिल से निकाल नहीं
अभी तो ख़ुश नुमा हूं कोई आशिक़ वाला हाल नहीं

हां मेरा यार रातों को छोड़ छड़ कर दिन में निकलता है
मगर इसका ये मतलब नहीं कि वो हिलाल नहीं

मरें वबा से तो करतें हैं गिनतियां ये लोग
मरें जो भूख से किसी को उसका ख़्याल नहीं

अपने अहबाबों को एक बार देख को सोचो
कि कुछ दिन घर में रहना इतना भी मुहाल नहीं

न कर घर में जरूरतों कि चीज़ें इकठ्ठी अख़्तर
यहां पर बस इक तेरी ज़िन्दगी का सवाल नहीं

पढ़ कुछ तू भी किताबों में जो लिखा है अख़्तर
शेख़ साहब कि सारी बातें भी तो हलाल नही

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 18 मार्च 2020

Ghazal : aisa bhi to ho sakta hai

मैंने सूखन बस तुम पे लिखा हो ऐसा भी तो हो सकता है
तुम ने मुझको पागल किया हो ऐसा भी तो हो सकता है

तेरे हुस्न-ओ-जमाल को मैंने चांद-सितारे कह डाले
ये सब मैंने झूठ कहा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

अपने रक़ीब कि इतनी खुशी को देख के मैंने ये सोचा 
वो भी तेरे पहलू से उठा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

माना 'अख़्तर' बे-कद्र सलीके वाला बे-हुनरी से राब्ता है 
पर ये सब मैंने तुम से सीखा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

छुपते-छुपाते तेरी नज़रों से बज़्म में 'अख़्तर' आया हो
तुमने मुझको देख लिया हो ऐसा भी तो हो सकता है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 10 मार्च 2020

ghazal

ख्वाहिश ए शम्मा भूझा चुका हूं मैं
ऐसे खुद को डरा चुका हूं मैं

अब इसे रास कुछ न आएगा 
दिल को गम चखा चुका हूं मैं

मुझे दुख है सो बस यही दुख है 
कि उस से दिल लगा चुका हूं मैं

सब रो रहे हैं फकत इक गम पर
जिस का जश्न मना चुका हूं मैं  

अब मुझे रात आगोश में लेगी 
अपना बिस्तर बना चुका हूं मैं 

अब मेरा क्या करेगी वो सोचो
जिसको अपना बता चुका हूं मैं

जो कुछ बचा है सो वो इक जां है 
बाकी सब कुछ लुटा चुका हूं मैं

अब 'अख़्तर' को नींद कैसे आएगी 
शब ए गम सुना चुका हूं मैं 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 9 मार्च 2020

ghazal : lage hain ab

कुछ हम भी चाहते हैं वो हम-सुखन रहें 
कुछ वो भी नई बात बनाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी उसे चाहने के काबिल नहीं रहे 
कुछ वो भी हम से नज़रें चुराने लगे हैं अब 

कुछ हम चाहते हैं कि बर्बाद ही रहें
कुछ वो भी हम से दूरी बढ़ाने लगे हैं अब

कभी हम भी चाहते हैं कि उनसे डरे नहीं 
कुछ वो भी हमको आंख दिखाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि फुरकत सितम करे
कुछ वो भी हम को छोड़ के जाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि हो उनका सामना 
कुछ वो भी मेरे सपनों आने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि 'अख़्तर' तबाह हो 
कुछ वो भी मेरी ख़ाक उड़ाने लगे हैं अब 

Akhtar Parwez Dehlvi 

रविवार, 1 मार्च 2020

ग़ज़ल : क्या है

जब उसके पहलू मैं बैठूं तो फिर निस्बत क्या है
जब उससे दूर हो जाऊं तो फिर फ़ुर्क़त क्या है

माना हम दोनों में मोहब्ब्त नहीं गर है भी तो 
फिर भी हम दोनों को मिलने की जरूरत क्या है 

आजकल नाम तेरा अपने नाम से मिला कर लिखूं
गर ये नहीं हिम्मत तो फिर हिम्मत क्या है 

उसका सांस भी लेना अक्सर सुनाई देता है 
मैं क्या बताऊं यार तुझे की क़ुर्बत क्या है 

हजारों ज़ुल्म ओ सितम रोज़ सेहती है चुप चाप
और तुम ये कहते हो वो क्या है औरत क्या है 

हम नाकामियों में रश्क करने वाले लोग 
क्या करेगे ये जान के कि शोहरत क्या है

गर नहीं मैं तुझको पसंद ठीक है दुश्मन न समझ
वैसे 'अख़्तर' जानता है तोहमत क्या है नफ़रत क्या है 

अख़्तर परवेज़ देहलवी

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

ghazal

ऐ ज़िन्दगी या तो तू मलाल कर इस सवाल पर
या मुझे हक दे की थोड़ा गम मना लूं हाल पर 

मैं तेरा आशिक़ हूं जानां और आशिक़ ज़ात भी 
तू ज़रा नज़रें उठा दे अपने इस जमाल पर

ज़िन्दगी जी लें या फिर खुद-ख़ुशी अंज़ाम हो 
मैं शब ओ रात सोचता बहुत हूं इस खयाल पर 

तू बड़ा शायर बना फिरता है 'अख़्तर' क्या है तू?
चल तू पहले इक शेर ही कह दे मेरे इस हाल पर

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

ग़ज़ल : बात बात पे

वो मुझ से यूं झगड़ता रहा बात बात पे
मैं भी ग़ज़ल लिखता रहा बात बात पे

झगड़े में कितनी बार लिया लब का बोसा
और वो आंखों को मलता रहा बात बात पे

मैंने अभी तक इश्क़ का किया नहीं इज़हार
लेकिन मैं उससे मिलता रहा बात बात पे

एक साथ सैकड़ों से इश्क़ मैंने कर लिया 
उसके बाद मैं हँसता रहा बात बात पे

'अख़्तर' यकीं कर मेरा जादू निगाह है वो 
और मैं आंखे ही देखता रहा बात बात पे 

Akhtar Parwez Dehlvi

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

ghazal :

साक़ी अब वो बात नहीं पैमाने में
बस बादा है तेरे इस बादा-खाने में

मेरी रात गुजरती थी उसके चौखट पर
फिर मुझे ढूंढने क्यूं आए हो मयखाने में

एक तो उसकी जुदाई उपर से गम-ए-फ़िराक़
और एक तो जी भी नहीं लग रहा वीराने में

मर गया 'अख़्तर' चलो जान छुट्टी उस पागल से
ये जुमला गूंज रहा था सनम खाने में

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

ghazal : chahati ho

तुम वो आशिक़ पुराना चाहती हो ?
माने दर्द फिर जगाना चाहती हो ? 

मेरी हर इक बात पर इख़्तिलाफ़ी 
कोई रिश्ता बनाना चाहती हो ?

मेरे पास मैं खुद भी नहीं हूं 
तुम किसको पाना चाहती हो ?

मेरे पास चंद आंसु और इक ग़म
तुम क्या लिखवाना चाहती हो ?

मैं तो इक दीवानी चाहता हूं
तुम भी इक दीवाना चाहती हो ?

'अख़्तर' को खुद से मोहब्बत भी नहीं
तुम 'अख़्तर' से दिल लगाना चाहती हो ?

Akhtar Parwez Dehlvi

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

ghazal

आज तनहाई ने नाशाद कर दिया मुझको 
कि अपने कैद से आज़ाद कर दिया मुझको 

वो इक शख़्स जिसका नाम मुझे याद नहीं 
उसी शख़्स ने फ़रहाद कर दिया मुझको 

जिस ख़ुशी ने दामन भरे थे मेरे कभी
उसी ख़ुशी ने बर्बाद कर दिया मुझको 

अपने ऐब को कोसता रहा मैं मुद्दातों 
उसी ऐब ने उस्ताद कर दिया मुझको 

पता चला कि 'अख़्तर' को गम मिलेंगे यहां 
इस इक बात ने तो शाद कर दिया मुझको

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

शनिवार, 11 जनवरी 2020

ghazal : dagaa kar ke

फंसा दिया है तूफ़ान में किनारे ने दग़ा कर के
उसे सकून तो होगा मुझ को फ़ना कर के

समुंदर भी तो रोया था ज़ालिम तेरी ज़ुल्मत पर
वो अपना दुख बताता है किनारे से टकरा के

ये तेरा खुमार ए हुस्न मुझे बेकरार करता है
मैं तुझसे इसलिए मिलता हूं थोड़ा सा नशा कर के

मेरी आखों की बेचैनी तुझे बर्बाद न कर दे
मैं तुझसे बात करता हूं नज़रों को झुका कर के

सितारों मेरा दुख समझो झगडों न आसमां से तुम
तुम मेरा दर्द बढ़ा दोगे ज़मीं को खफा कर के

पिला न उनको अब साक़ी मीना मेरी ओर कर लेतू

 'अख़्तर' को होश में ले आ थोड़ी सी चखा कर के 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

बुधवार, 8 जनवरी 2020

ग़ज़ल : बात करें

कभी तो आप सितमगरों की बात करें 
कभी तो आप बे घरों की बात करें 

हमारे हाथ में मोहब्बत कि किताबें हैं
और आप पथरों की बात करें 

यहां पड़े है कितने लहू परिंदों के
और आप मंजरों की बात करें 

तुम्हारे आंख का कतरा लहू है न ?
फिर क्यूं समुंदरों की बात करें ?

'अख़्तर' तेरे बस कहां नज़्म समझना 
फिर भी चल सुख़न-वरों की बात करें 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

ग़ज़ल : किस तरह

तुमसे हम अपनी नज़रें मिलाएंगे किस तरह 
तुम से हम दिल की बात बताएंगे किस तरह 

तुमने जो दिल में आग लगा दी है ठीक है
लेकिन ये बताओ कि भूझाएंगे किस तरह 

रस्ता तमाम मुझ को दिखाया है कोई और 
ऐसे तुम्हारे घर में हम आएंगे किस तरह 

हम ने भी मुस्कुरा के केह दिया सब ठीक है 
अब दिल में लगे घाव दिखाएंगे किस तरह 

हमने सुना है सब से वफा कर रहे हो तुम 
ऐसे रकीब तुमको आजमाएंगे किस तरह 

ये दर्द नुमा फन है तुम खुश नुमा वजूद
सुखंवरी तुम को सिखाएंगे किस तरह 

'अख़्तर' तू इस बात पर नाराज़ न होना 
पर तेरी ग़ज़ल पढ़ के होश में आएंगे किस तरह

अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 1 जनवरी 2020

ग़ज़ल: दोस्त

हम भी उम्मीद में हैं आएगा मयख़्वार ए दोस्त 
तब कहीं जा के इस बरस होगा दीदार ए दोस्त 

किया इलाज उसने इस दिल का कि मत पूछो
दे गया मुझे ग़म ए इश्क़ मेरा बीमार ए दोस्त

मैंने पहले ही कहा था कि मुझे दूर रहो, हां
अब हो गयाना तुझे ग़म मेरे ग़म-ख़्वार-ए-दोस्त

हाल मेरा क्या होता है मुझे क्या मालूम
जब जब देख लेता हूं मैं रुख़्सार ए दोस्त

पड़ी इक निग़ाह तो दीवाने उठ के बैठ गए 
अब ऐसे ही तो नहीं मशहूर बाज़ार ए दोस्त 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...