शनिवार, 12 दिसंबर 2020
ग़ज़ल: क्या करोगे
बुधवार, 25 नवंबर 2020
ग़ज़ल : किया गया
शुक्रवार, 20 नवंबर 2020
ग़ज़ल : लग रही थी
बुधवार, 18 नवंबर 2020
ग़ज़ल
शनिवार, 31 अक्टूबर 2020
किसी से इश्क़ भी करते नहीं हम
बुधवार, 5 अगस्त 2020
Ghazal
कहेंगे ज़ालिम को ज़ालिम, ज़रा भी कम नहीं होंगे
भले वो कुछ भी हो जाएं, कभी मोहतरम नहीं होंगे
मैं इसका ख़ुद ही शाहिद हूं तुम्हें कैसे पता होगा
तुम्हें लगता है कैसे, हंसते चेहरों को ग़म नहीं होंगे
मैं हंसता हूं या रोता हूं, ये काम खिलवत में होता है
अगर सर ए बाज़ार रोऊं तो, फिर वो पुर-नम नहीं होंगे
ये कैसा इश्क़ है तेरा, फ़ना होना तो लाज़िम था
जब वो मुझ को चूमेगा फिर वो हम, हम नहीं होंगे
तू मुझ को अब तो न तड़पा, करीब आजा करीब आजा
कहीं ऐसा न हो तू आए और दो अलम नहीं होंगे
'अख़्तर' में हुनर इक है वो रोता है बस रोता है
रोने का भी इक ग़म है कि वो पुर-ग़म नहीं होंगे
परवेज़ अख़्तर
बुधवार, 29 जुलाई 2020
Ghazal
गुरुवार, 23 जुलाई 2020
Ghazal : ho sakti hai
शनिवार, 18 जुलाई 2020
ghazal
गुरुवार, 16 जुलाई 2020
नज़्म : घर जल्दी आ जाना
मंगलवार, 14 जुलाई 2020
Ghazal:
क्या मिला उसे इन आंखों को लहू कर के
वो मुझ को भूल गया मेरी आरज़ू कर के
यही एक ख़्वाहिश पर जीते रहें हम बरसों
करेगा हम से गिले हमको रु-ब-रु कर के
लब को चूम लिए और उसके बाद उसने
मुझे ही छोड़ दिया जिस्म-ए-रंग-ओ-बू कर के
मुझे पता है कि आप गैरों को कहा जाता है
मैं इंतज़ार में हूं कब बोलेगा मुझ को तू कर के
चल 'अख़्तर' मान जा होता है ज़िन्दगी में यही
तुझे मिलेगा भी क्या उसकी जुस्तुजू कर के
परवेज़ अख़्तर
सोमवार, 25 मई 2020
नज़्म : रोना होगा
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020
ghazal
सोमवार, 13 अप्रैल 2020
Ghazal
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020
ग़ज़ल : नज़र आते हैं
मंगलवार, 7 अप्रैल 2020
नज़्म
शनिवार, 4 अप्रैल 2020
Ghazal
कभी कभी तो लगता है उससे किनारा कर लूं
और कभी यूं भी लगता है बस गुज़ारा कर लूं
तमाम शहर को उसे देखने की चाहत है
मैं उस ग़ुलाब पे अपना ही इजारा कर लूं
वो उस चमन में रहता है अकेला तन्हा
वो ज़रा बाग़ में निकले तो नज़ारा कर लूं
अब तो तन्हाई ही रास आने लगी है 'अख़्तर'
मैं ये सोच रहा हूं अब इश्क़ दोबारा कर लूं
ताज़ा फसाने की चाहत नहीं 'अख़्तर' मुझको
कि उसी बेवफा को फिर से मैं गवारा कर लूं
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
शुक्रवार, 27 मार्च 2020
ghazal
अभी तू मुझको अपने दिल से निकाल नहीं
अभी तो ख़ुश नुमा हूं कोई आशिक़ वाला हाल नहीं
हां मेरा यार रातों को छोड़ छड़ कर दिन में निकलता है
मगर इसका ये मतलब नहीं कि वो हिलाल नहीं
मरें वबा से तो करतें हैं गिनतियां ये लोग
मरें जो भूख से किसी को उसका ख़्याल नहीं
अपने अहबाबों को एक बार देख को सोचो
कि कुछ दिन घर में रहना इतना भी मुहाल नहीं
न कर घर में जरूरतों कि चीज़ें इकठ्ठी अख़्तर
यहां पर बस इक तेरी ज़िन्दगी का सवाल नहीं
पढ़ कुछ तू भी किताबों में जो लिखा है अख़्तर
शेख़ साहब कि सारी बातें भी तो हलाल नही
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
बुधवार, 18 मार्च 2020
Ghazal : aisa bhi to ho sakta hai
मंगलवार, 10 मार्च 2020
ghazal
सोमवार, 9 मार्च 2020
ghazal : lage hain ab
रविवार, 1 मार्च 2020
ग़ज़ल : क्या है
शनिवार, 22 फ़रवरी 2020
ghazal
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020
ग़ज़ल : बात बात पे
सोमवार, 10 फ़रवरी 2020
ghazal :
साक़ी अब वो बात नहीं पैमाने में
बस बादा है तेरे इस बादा-खाने में
मेरी रात गुजरती थी उसके चौखट पर
फिर मुझे ढूंढने क्यूं आए हो मयखाने में
एक तो उसकी जुदाई उपर से गम-ए-फ़िराक़
और एक तो जी भी नहीं लग रहा वीराने में
मर गया 'अख़्तर' चलो जान छुट्टी उस पागल से
ये जुमला गूंज रहा था सनम खाने में
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020
ghazal : chahati ho
गुरुवार, 30 जनवरी 2020
ghazal
शनिवार, 11 जनवरी 2020
ghazal : dagaa kar ke
फंसा दिया है तूफ़ान में किनारे ने दग़ा कर के
उसे सकून तो होगा मुझ को फ़ना कर के
समुंदर भी तो रोया था ज़ालिम तेरी ज़ुल्मत पर
वो अपना दुख बताता है किनारे से टकरा के
ये तेरा खुमार ए हुस्न मुझे बेकरार करता है
मैं तुझसे इसलिए मिलता हूं थोड़ा सा नशा कर के
मेरी आखों की बेचैनी तुझे बर्बाद न कर दे
मैं तुझसे बात करता हूं नज़रों को झुका कर के
सितारों मेरा दुख समझो झगडों न आसमां से तुम
तुम मेरा दर्द बढ़ा दोगे ज़मीं को खफा कर के
पिला न उनको अब साक़ी मीना मेरी ओर कर लेतू
'अख़्तर' को होश में ले आ थोड़ी सी चखा कर के
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
बुधवार, 8 जनवरी 2020
ग़ज़ल : बात करें
गुरुवार, 2 जनवरी 2020
ग़ज़ल : किस तरह
बुधवार, 1 जनवरी 2020
ग़ज़ल: दोस्त
Ghazal
mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya ...
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हम तुम को इस क़दर देखें तुम्हारे लब पे चश्म-तर देखें ये तेरे शबनम ओ शबाब को सारे दुनिया के सुखनवर देखें तेरी चाहत को तेरी यादों को हम ...
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आज की रात कुछ और नज़ारे निकले जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले खो ...