आज तनहाई ने नाशाद कर दिया मुझको
कि अपने कैद से आज़ाद कर दिया मुझको
वो इक शख़्स जिसका नाम मुझे याद नहीं
उसी शख़्स ने फ़रहाद कर दिया मुझको
जिस ख़ुशी ने दामन भरे थे मेरे कभी
उसी ख़ुशी ने बर्बाद कर दिया मुझको
अपने ऐब को कोसता रहा मैं मुद्दातों
उसी ऐब ने उस्ताद कर दिया मुझको
पता चला कि 'अख़्तर' को गम मिलेंगे यहां
इस इक बात ने तो शाद कर दिया मुझको
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें