काश उस से मेरा इतना तो रिश्ता हो जाए
कम से कम दर्द मेरा सुन के वो अच्छा हो जाए
उसने चाहा भी नहीं दर्द मेरा दरमाँ करना
मैंने चाहा भी न था दर्द मेरा अच्छा हो जाए
दिल मेरा उस से बेहलता ही नहीं अब के बरस
मुझको डर है की कहीं अब के न ख़दशा हो जाए
अब मुझे उस से मोहब्बत तो नहीं है फिर भी
दिल ये चाहता है की उस यार का गोया हो जाए
अब मुझे बज़्म से डर तो नहीं लगता है मगर
मेरी ख़वाइश है की वो शख़्स भी तन्हा हो जाए
होंठ उसके सुबू - मीना के बराबर तो नहीं
इसमें क्या हर्ज हो गर होंठ का जल्वा हो जाए
उसको चूमो की मैं सोचूं की मैं चाहूं हर दम
गर वो साक़ी एक पल के लिए मेरा हो जाए
कह के 'अख़्तर' वो तुझे छोड़ गया है अब के
तुझ से अच्छा तो मेरा जिस्म ही रुस्वा हो जाए
परवेज़ अख़्तर