हम वाक़िफ़ न थे इस शहर के आज़ारों से
लूट के ले गई ग़रीब के निवाले तक वो
कोई उम्मीद नहीं अहद के सरकारों से
हां तेरे हुस्न के हक़दार यकीं कर हम हैं
हमें कोई ख़ौफ़ नहीं है तेरे परस्तारों से
आ गया इनको भी हां दर्द समझने का हुनर
अब कोई काम नहीं लेता मैं अशआरों से
लेके कासे में दो चार ख़ुदी के टुकड़े
यूंही बेकार निकल जाता हूं बाज़ारों से
ढूंढ सकते हो तो जरा ढूंढ के देखो 'अख़्तर'
आजकल रब्त मेरा है ज़रा बेज़ारों से
~परवेज़ अख़्तर
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