मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
ये मुझे कैसी चाहत हो गई है
वो मेरे साथ बैठी थी कल तक
ना जाने अब किस की हो गई है
मैंने बहुत अजीब ख्वाब देखा
की वो फिर से मेरी हो गई है
न जाने किस सफर में आ गया हूं
मेरी मंज़िल ही मुझसे खो गई है
उसकी आंखो में खुद को पा लिया है
मगर वो चीज क्या है जो खो गई है
ऐसे खुद पे क्यों अकड़े हो 'अख़्तर'
ज़रा सी पहचान ही तो हो गई है
AKHTAR PARWEZ DEHLVI