शनिवार, 15 जून 2019

ग़ज़ल : मुझे उससे मोहब्बत हो गई है

मुझे उससे मोहब्बत हो गई है
ये मुझे कैसी चाहत हो गई है

वो मेरे साथ बैठी थी कल तक
ना जाने अब किस की हो गई है

मैंने बहुत अजीब ख्वाब देखा
की वो फिर से मेरी हो गई है

न जाने किस सफर में आ गया हूं
मेरी मंज़िल ही मुझसे खो गई है

उसकी आंखो में खुद को पा लिया है
मगर वो चीज क्या है जो खो गई है

ऐसे खुद पे क्यों अकड़े हो 'अख़्तर'
ज़रा सी पहचान ही तो हो गई है

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 1 जून 2019

ग़ज़ल : मान ले साकी

मेरी इक बात बहर-ए-खुदा मान ले साकी
पैमाना छोड़ तू आंखों से जान ले साकी

रहूं ना होश में कुछ इसक़दर पीला दे मुझे
फिर उसके बाद मेरे दिल का बयान ले साकी

पहले अपने एब को हुनर में तब्दील कर
फिर रफ्ता-रफ्ता अपनी उड़ान ले साकी

हुआ नाकाम तो मय खाने से निकाल देना मुझे
मगर उससे पहले मेरा इम्तिहान ले साकी

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...