शनिवार, 22 जुलाई 2023

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya 
main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya 

mujh ko dekho main hasti e nakaam hun kaam ka mujh ko aata nahi kuch hunar 
Kuch guzaari ye kahte hue gham na kar kuch guzaari ki gham Mukhtasar rah gaya 

mujh ko phunka hai usne dikha ke nazar hum pe guzari hai kya haan jaan e jigar
Ye badan to chala aaya raah e guzar ek dil tha jo uske hi ghar rah gaya 

mujh ko bhata nahi hai koi charagar isliye hi to dar dar bhatakta hun main 
isliye hi mughaffal hain saare hi dar mere kuche mein gar charagar rah gaya 

ek gham ka sahara bacha hai mujhe, itna chaha hai akhtar ki gham kam na ho
sare gham ka madava hi ho jayega der tak sajde mein main agar rah gaya

Parwez Akhtar 


बुधवार, 7 सितंबर 2022

ग़ज़ल


काश उस से मेरा इतना तो रिश्ता हो जाए 
कम से कम दर्द मेरा सुन के वो अच्छा हो जाए 

उसने चाहा भी नहीं दर्द मेरा दरमाँ करना 
मैंने चाहा भी न था दर्द मेरा अच्छा हो जाए 

दिल मेरा उस से बेहलता ही नहीं अब के बरस
मुझको डर है की कहीं अब के न ख़दशा हो जाए 

अब मुझे उस से मोहब्बत तो नहीं है फिर भी
दिल ये चाहता है की उस यार का गोया हो जाए

अब मुझे बज़्म से डर तो नहीं लगता है मगर 
मेरी ख़वाइश है की वो शख़्स भी तन्हा हो जाए

होंठ उसके सुबू - मीना के बराबर तो नहीं 
इसमें क्या हर्ज हो गर होंठ का जल्वा हो जाए

उसको चूमो की मैं सोचूं की मैं चाहूं हर दम 
गर वो साक़ी एक पल के लिए मेरा हो जाए

कह के 'अख़्तर' वो तुझे छोड़ गया है अब के
तुझ से अच्छा तो मेरा जिस्म ही रुस्वा हो जाए

परवेज़ अख़्तर

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

ग़ज़ल

मुझे अपना सा बना दे अब मुझे अहल ए सर ए अंदाज दे
मुझे ढूंढ कर मेरे हम नाशीन मुझे इल्म ए ज़ात नवाज़ दे

मैं इस दश्त में हूं नया नया मेरे सामने अहद ए बहार है
मेरी जां निसार तमन्ना हां मुझे आ के अहल ए ईजाज़ दे

मुझे हिम्मत ओ हौसला है नहीं बस बेचैनियों का ज़ख़ीरा हूं
तू ही आ के मेरे जान ए जां इस इश्क को तू आग़ाज़ दे

मुझे अपना तो कुछ पता नहीं मुझे होश इतना तो है मगर
तेरी ख़ुश नज़र का ख़्याल है इसी ख़ुश नज़र का एज़ाज़ दे

तेरे चाहने वालों में भी एक नाम हां 'अख़्तर' का है यकीं
अगर आस है तो यक़ीन कर गर नहीं यकीं तो आवाज़ दे

परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

Ghazal

छीन गई सीरत ए मेयार इन अख़बारो से
हम वाक़िफ़ न थे इस शहर के आज़ारों से

लूट के ले गई ग़रीब के निवाले तक वो
कोई उम्मीद नहीं अहद के सरकारों से 

हां तेरे हुस्न के हक़दार यकीं कर हम हैं
हमें कोई ख़ौफ़ नहीं है तेरे परस्तारों से

आ गया इनको भी हां दर्द समझने का हुनर
अब कोई काम नहीं लेता मैं अशआरों से

लेके कासे में दो चार ख़ुदी के टुकड़े
यूंही बेकार निकल जाता हूं बाज़ारों से

ढूंढ सकते हो तो जरा ढूंढ के देखो 'अख़्तर'
आजकल रब्त मेरा है ज़रा बेज़ारों से

~परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 15 जनवरी 2022

ghazal

दिखता है तेरा अक़्स ही जाए जिधर से हम
सो अब नहीं जाएंगे कहीं अपने घर से हम

मुझ को नहीं पता हरम नहीं बुतकदे ग़म
रखते हैं वास्ता बस तेरी रहगुज़र से हम

कभी हम कलाम भी हो कभी कैफ़ ए बहारांँ
करते हैं ये उम्मीद तेरी ख़ुशनज़र से हम

ये बेरुख़ी ये बेदिली ये बेज़ौक़ संग ए दिल
तू ही बता ऐ आश्ना गुज़रे किधर से हम

आए थे दर ए बिस्मिलॉ लेने हिसाब ए इश्क़
लौटे हैं बे क़ुसूर ही उस संग ए दर से हम

बख़्शी नही ज़रा भी कमी सीना किया है चाक
कुछ बा-हुनर तो वो भी हैं कुछ दाद-गर से हम

परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 29 जून 2021

Ghazal

मेरे दिल की आरजू है हां यही जुस्तुजू है
तेरे साथ ही सहर हो और हम तुझे संवारे

इन बेक़रारियों का सबब है तो बस यही है
तेरी चंचली आदाएं तेरी आंखों के इसारे

तुझे देखने से पहले पूछूंगा तेरी ख़्वाहिश 
गर मिल जाए इजाज़त तो हम तुझे निहारे

उसे देख कर के 'अख़्तर' खुद को छुपा रहा है
की जान ही न लेले उल्फत भरे नज़ारे

~परवेज़ अख़्तर

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

ग़ज़ल

तुम ही ने मुझ को दिलासे ही इतने दे डाले
यकीं तो कर लिया मगर एतिबार हो न सका

तेरे ही लम्स से मुझ को मिला क़रार ओ शकेब
तो तेरा जिस्म मुझे ना-गवार हो न सका

यकीं तो था की आएगा एक दिन वापिस
मुझ बदनसीब से ही इंतजार हो न सका

यही तो तजर्बा मुझ को रहा मोहब्बत में
बदन बदन से मिले इश्क प्यार हो न सका

ये चारागार अब मुझ को शराब ए इश्क पिला
तेरा इलाज तो अब बरक़रार हो न सका


परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 23 मार्च 2021

ghazal

ये कैसे तूने शेर कहे दर्द ओ रंज पर
पढ़ते है उसे ख़ूब हंसी आए है अख़्तर

पहले सनमकदे गया फिर मयकदे गया
तू भी कहां कहां भटक जाए है अख़्तर

उसका मिजाज़ ख़ुश नुमा ज़्यादा ही हो गया
लगता है उसको दर्द मेरा भाए है अख़्तर

न तो ग़ज़ल में नाम है न ज़िक्र ही उसका
फिर भी वो मेरी बात समझ जाए है अख़्तर

परवेज़ Akhtar

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

ग़ज़ल

हम को हमारे नाम से पुकारा नहीं गया 
अच्छा हुआ कि कोई इशारा नहीं गया 

हम को कभी हकीर कहा और कभी ज़लील
इतना करम हुआ कि गवारा नहीं गया 

ये भी गिला रहा कि कहा हम को क़ैस ए यार
और हम को पत्थरों से भी मारा नहीं गया 

नंगे हुए जो बेच के अपना इमां तमाम
बस उनसे अपना पैराहन उतारा नहीं गया 

परवेज़ अख़्तर

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

ग़ज़ल

मैं अपने ग़म में वाबस्ता अभी हूं
ज़रा ठहरो संवर कर आ रहा हूं

तुम्हारे होंठों पर कैसा तबस्सुम 
लगता है नज़र मैं आ रहा हूं 

संवारने का यही दस्तूर है क्या?
बिखरता ही बिखरता जा रहा हूं 

जब से चूमा है सारा जिस्म तेरा
बेहक़ता और निखरता जा रहा हूं

परवेज़ अख़्तर







Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...