पढ़ते है उसे ख़ूब हंसी आए है अख़्तर
पहले सनमकदे गया फिर मयकदे गया
तू भी कहां कहां भटक जाए है अख़्तर
उसका मिजाज़ ख़ुश नुमा ज़्यादा ही हो गया
लगता है उसको दर्द मेरा भाए है अख़्तर
न तो ग़ज़ल में नाम है न ज़िक्र ही उसका
फिर भी वो मेरी बात समझ जाए है अख़्तर
परवेज़ Akhtar
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