शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

ग़ज़ल

मैं अपने ग़म में वाबस्ता अभी हूं
ज़रा ठहरो संवर कर आ रहा हूं

तुम्हारे होंठों पर कैसा तबस्सुम 
लगता है नज़र मैं आ रहा हूं 

संवारने का यही दस्तूर है क्या?
बिखरता ही बिखरता जा रहा हूं 

जब से चूमा है सारा जिस्म तेरा
बेहक़ता और निखरता जा रहा हूं

परवेज़ अख़्तर







रविवार, 10 जनवरी 2021

ग़ज़ल

मुझ को दिलासा देती रही बेख़ुदी मेरी
मैं ख़ुद ही अपने आप से इंकार कर गया

सोचा जो मैंने उल्फ़त ए दुनिया किसे मिली
फिर से मैं अपने आप को बीमार कर गया

तुझ को नहीं है मुझ से मोहब्बत तो न सही 
ये कह के उस से आज में तकरार कर गया

मुझ को नहीं है अपने फ़न पे यकीन अब
मैं तेरे हुस्न ए ज़ात से इंकार कर गया

'अख़्तर' बद किस्मती है छूना न मुझ को तू
फिर ये न कहना कोनसा आज़ार कर गया

परवेज़ अख़्तर 

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

किताब

तुझे तोहफ़े में एक किताब दूं
वो किताब मैंने लिखी है जो
शायद थोड़ा ये कम कर दे 
तेरी मुझ से बेहिसी है जो

इस किताब में तेरा ज़िक्र है
तेरे हुस्न की तहरीर है
ये किताब तेरे ही नाम है 
ये तेरी ही जागीर है 

इस किताब में तेरा रोना है 
मगर रोने का कोई सबब नहीं 
इस किताब में तेरा फ़र्द है 
कि तुझे ख़ुशी की कोई तलब नहीं

फिर सोचता हूं 
ये किताब कहीं तेरे क़र्ब को बढ़ा न दे 
और मुझे तेरी नजरों में 
और नीचे गिरा न दे 

चल रहने दे 
तू किताब छोड़
मैं कुछ और ही सोच लेता हूं 
पर मेरे पास तो और कुछ भी नहीं 
मैं अपना वक़्त तोहफ़े में देता हूं


परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...