सोमवार, 27 मई 2019

ग़ज़ल : अच्छा होता

तू सबके साथ ना चलता तो अच्छा होता
कभी खुद से भी मिलता तो अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों को समझता तो अच्छा होता
फिर मुझे मोहब्बत करता तो अच्छा होता

मेरे सनम तूने मुझे ये क्या बना डाला है
मेरा दिल पहले सा सच्चा होता तो अच्छा होता

मेरी जुबां को क़लम से काट कर बोला
काश तू झूठ ही कहता तो अच्छा होता

तू इतना परेशान है सदाक़त पसंद लगता है
वरना तेरा भी शहर में घर तो अच्छा होता

कल तुमने जो मुझे से बात कही थी 'अख़्तर'
वो बात खुद से भी कहता तो अच्छा होता 

उसने सच बोलने पे पाबंदी लगा रखी है
अख़्तर तू शायर न होता तो अच्छा होता

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शुक्रवार, 24 मई 2019

Ghazal : Mulaqat Hui

फिर तसव्वुर में उनसे आज मुलाकात  हुई
मुख्तसर सी ही मगर आज उनसे बात हुई

वो भी शर्मा से गए हम भी शर्मा से गए
ऐसा ही चलता रहा और फिर सबात हुई

ख़्वाब मे भी वो रकीबों की ही बातें करता
ऐसा लगा की वो जीता और मेरी मात हुई

चाँदनी उसके तो रहती है चार-सू अक़्सर
ये भी इक अजब की हुस्न-ए-ताजरबात हुई

मुद्दतों बाद उसने खुद को फिर से पहचाना
मुद्दतों बाद जब 'अख़्तर' से मुलाकात हुई

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

मंगलवार, 21 मई 2019

Ghazal : क्या मिला आपको, उससे रुलाने से

क्या मिला आपको, उससे रुलाने से
जो हंस रहा था मेरे अफसाने से

अब तू किस किरदार में है ये बता
कल इक शख्स पूछ रहा था इक दीवाने से

वो जो ज़ख्म है दिखा नहीं सकता में
जो मुझे मिल रहे थे इक ज़माने से

इस दर्द की क्या दुआ दूं तुझे ऐ साकी
बिना पियाए ही निकाल दिया शराब-खाने से

अब कुछ चाह नहीं रही 'अख़्तर'
सब मिल गया है उससे पाने से

'अख़्तर' को बहर-ए-खुदा आजमाना छोड़
'अख़्तर' टूट जाता है जादा आजमाने से

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

सोमवार, 20 मई 2019

Ghazal : बयां कर नहीं सकता

ऐ ज़िन्दगी तुझे अल्फ़ाज़ों में बयां कर नहीं सकता 
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता 

चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ 
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता 

खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है 
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता 

अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ 
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता 

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

रविवार, 19 मई 2019

ghazal : उसके कूचें में जो ठहरने वाला था

उसके कूचें में जो ठहरने वाला था
वो मेरा अहबाब निखारने वाला था

उसको खुद में ढूंढ रहा हूँ मुद्दत से
वो तो मुझमे एक घर करने वाला था

ज़िन्दगी ने हर मोड़ पे चोटें दी लेकिन
में भी कहाँ आसानी से बिखरने वाला था

जाने उसके इश्क़ ने क्या कमाल किया
वरना में थोड़ी सुधरने वाला था

किस्मत भी उस रस्ते पर आ कर बैठी थी
जो रास्ता में छोड़ के चलने वाला था

गोया उसको याद भी मेरी आयी कब
जब में उसके इश्क़ में मरने वाला था

इश्क़ ने तुझको तब भी घेर लिया 'अख़्तर'
तू तो उस रस्ते से,बच के निकलने वाला था

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

Ghazal: मुस्कुरा देता हूं

अब तो हालातों पे में मुस्कुरा देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं

तसव्वुर में तो वो रहती है मगर न जाने 
मै किसी और की तसवीर बना देता हूं

अब मुझे याद नहीं रहता कुछ उसके सिवा
न जाने किस-किस को अपने शेर सुना देता हूं

जमाल-ए-यार तो ना खुश ही नजर आता है
जब उसका नाम अपने नाम से मिला देता हूं

आंख नम है और होंठों पे तबस्सुम 'अख़्तर'
दुश्मन-ए-जां को कुछ ऐसे सज़ा देता हूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

शनिवार, 18 मई 2019

ग़ज़ल : बता कब तक करूं

मुंतजिर-ए-मदवा-ए-दिल-ए-बीमार बता कब तक करूं
मसीहा का इंतज़ार बता कब तक करूं

तू आज हमनशीं हुआ मुद्दातों बाद
में तेरा दीदार बता कब तक करूं

उसे पाना है तो बर्बाद होना पड़ता है
में खुद को मिस्मार बता कब तक करूं

आज खुद का ही सामना होगा मैदान में
में खुद को तैयार बता कब तक करूं

हुआ है इश्क़ मुझे ऐ बेखबर सुन ले
में इसका प्रचार बता कब तक करूं

तेरे पास तो चाहने वालों की फेहरिस्त है
में खुद को दावेदार बता कब तक करूं

कोई किरदार अख़्तर के निसिब में नहीं
मगर खुद को अदाकार बता कब तक करूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

गुरुवार, 16 मई 2019

Ghazal : Bimaar kar gya

आने वाली ख़ुशी से खबरदार कर गया
मुझको यार बेवजह बीमार कर गया

ले देके मेरे पास इक एब ही तो था
इसको भी हुनर करके वो बेकार कर गया

जो आईना उसकी हकीकत बताता था
वो आइने के बीच में दीवार कर गया

पाबंदी थी जिसे देखने की सारे शहर में
मैं आइने में उसका दीदार कर गया

वो बस इक ही पल ही तो गुजरा था कुचें से
जाते जाते सरी गली गुलज़ार ए महकार कर गया

'अख़्तर' तो फ़ना हो रहा था कहानी में अपने
मगर पूछने पे हंसते हंसते इनकार कर गया

उस शख्स को 'अख़्तर' से मोहब्बत तो होगी ?
ये सवाल ही 'अख़्तर' के लिए दरकार कर गया

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

मंगलवार, 7 मई 2019

Ghazal : Agar ye Ishq khasara hai

अगर ये इश्क़ ख़सारा है तो ख़सारा करते
इस ख़सारा का भी हंसते हुए नज़ारा करते

हम भला किस-किस को गंवार करते
इससे बेहतर था कि खुद से किनारा करते

मुद्दत से तुमने देखा ही नहीं मेरी जानिब
तुम नज़रें मिलते हमसे तो इशारा करते

आंख खुलते ही तेरा हुस्न हम-नशीन होता
कुछ इस तरह हम ज़िन्दगी गुजरा करते

इसी इंतज़ार में बसर हुई है ज़िन्दगी मेरी
वो भी तो कभी 'अख़्तर' को पुकारा करते

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

बुधवार, 1 मई 2019

Ghazal : बर्बादी

मेरी इब्तादा थी बर्बादी मेरी इंतेहा है बर्बादी
जिससे ना मिला रहा बर्बाद, मिल गया तो बर्बादी

मेरे रास्ते तो वीरान हैं मेरे साथ क्यूं चले कोई
मेरे मंज़िल ए मुकद्दर का इक मुकद्दर है बर्बादी

तबस्सुम ए किताब को कल पढ़ा मैंने था
हर एक पन्ने पर हर एक लफ्ज़ था बर्बादी

कल एक आशिक़ को देख कर हसद में था
उसकी जैसी हालत की मेरी भी कर बर्बादी

इतनी खुशी में तो जी नहीं सकता मैैं
'अख़्तर' को तबस्सुम में छोड़ ना तू बर्बादी

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...