आने वाली ख़ुशी से खबरदार कर गया
मुझको यार बेवजह बीमार कर गया
ले देके मेरे पास इक एब ही तो था
इसको भी हुनर करके वो बेकार कर गया
जो आईना उसकी हकीकत बताता था
वो आइने के बीच में दीवार कर गया
पाबंदी थी जिसे देखने की सारे शहर में
मैं आइने में उसका दीदार कर गया
वो बस इक ही पल ही तो गुजरा था कुचें से
जाते जाते सरी गली गुलज़ार ए महकार कर गया
'अख़्तर' तो फ़ना हो रहा था कहानी में अपने
मगर पूछने पे हंसते हंसते इनकार कर गया
उस शख्स को 'अख़्तर' से मोहब्बत तो होगी ?
ये सवाल ही 'अख़्तर' के लिए दरकार कर गया
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
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