अगर ये इश्क़ ख़सारा है तो ख़सारा करते
इस ख़सारा का भी हंसते हुए नज़ारा करते
इस ख़सारा का भी हंसते हुए नज़ारा करते
हम भला किस-किस को गंवार करते
इससे बेहतर था कि खुद से किनारा करते
मुद्दत से तुमने देखा ही नहीं मेरी जानिब
तुम नज़रें मिलते हमसे तो इशारा करते
आंख खुलते ही तेरा हुस्न हम-नशीन होता
कुछ इस तरह हम ज़िन्दगी गुजरा करते
इसी इंतज़ार में बसर हुई है ज़िन्दगी मेरी
वो भी तो कभी 'अख़्तर' को पुकारा करते
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
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