मेरी इब्तादा थी बर्बादी मेरी इंतेहा है बर्बादी
जिससे ना मिला रहा बर्बाद, मिल गया तो बर्बादी
मेरे रास्ते तो वीरान हैं मेरे साथ क्यूं चले कोई
मेरे मंज़िल ए मुकद्दर का इक मुकद्दर है बर्बादी
तबस्सुम ए किताब को कल पढ़ा मैंने था
हर एक पन्ने पर हर एक लफ्ज़ था बर्बादी
कल एक आशिक़ को देख कर हसद में था
उसकी जैसी हालत की मेरी भी कर बर्बादी
इतनी खुशी में तो जी नहीं सकता मैैं
'अख़्तर' को तबस्सुम में छोड़ ना तू बर्बादी
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
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