बुधवार, 7 सितंबर 2022

ग़ज़ल


काश उस से मेरा इतना तो रिश्ता हो जाए 
कम से कम दर्द मेरा सुन के वो अच्छा हो जाए 

उसने चाहा भी नहीं दर्द मेरा दरमाँ करना 
मैंने चाहा भी न था दर्द मेरा अच्छा हो जाए 

दिल मेरा उस से बेहलता ही नहीं अब के बरस
मुझको डर है की कहीं अब के न ख़दशा हो जाए 

अब मुझे उस से मोहब्बत तो नहीं है फिर भी
दिल ये चाहता है की उस यार का गोया हो जाए

अब मुझे बज़्म से डर तो नहीं लगता है मगर 
मेरी ख़वाइश है की वो शख़्स भी तन्हा हो जाए

होंठ उसके सुबू - मीना के बराबर तो नहीं 
इसमें क्या हर्ज हो गर होंठ का जल्वा हो जाए

उसको चूमो की मैं सोचूं की मैं चाहूं हर दम 
गर वो साक़ी एक पल के लिए मेरा हो जाए

कह के 'अख़्तर' वो तुझे छोड़ गया है अब के
तुझ से अच्छा तो मेरा जिस्म ही रुस्वा हो जाए

परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...