शुक्रवार, 27 मार्च 2020

ghazal

अभी तू मुझको अपने दिल से निकाल नहीं
अभी तो ख़ुश नुमा हूं कोई आशिक़ वाला हाल नहीं

हां मेरा यार रातों को छोड़ छड़ कर दिन में निकलता है
मगर इसका ये मतलब नहीं कि वो हिलाल नहीं

मरें वबा से तो करतें हैं गिनतियां ये लोग
मरें जो भूख से किसी को उसका ख़्याल नहीं

अपने अहबाबों को एक बार देख को सोचो
कि कुछ दिन घर में रहना इतना भी मुहाल नहीं

न कर घर में जरूरतों कि चीज़ें इकठ्ठी अख़्तर
यहां पर बस इक तेरी ज़िन्दगी का सवाल नहीं

पढ़ कुछ तू भी किताबों में जो लिखा है अख़्तर
शेख़ साहब कि सारी बातें भी तो हलाल नही

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

बुधवार, 18 मार्च 2020

Ghazal : aisa bhi to ho sakta hai

मैंने सूखन बस तुम पे लिखा हो ऐसा भी तो हो सकता है
तुम ने मुझको पागल किया हो ऐसा भी तो हो सकता है

तेरे हुस्न-ओ-जमाल को मैंने चांद-सितारे कह डाले
ये सब मैंने झूठ कहा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

अपने रक़ीब कि इतनी खुशी को देख के मैंने ये सोचा 
वो भी तेरे पहलू से उठा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

माना 'अख़्तर' बे-कद्र सलीके वाला बे-हुनरी से राब्ता है 
पर ये सब मैंने तुम से सीखा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

छुपते-छुपाते तेरी नज़रों से बज़्म में 'अख़्तर' आया हो
तुमने मुझको देख लिया हो ऐसा भी तो हो सकता है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

मंगलवार, 10 मार्च 2020

ghazal

ख्वाहिश ए शम्मा भूझा चुका हूं मैं
ऐसे खुद को डरा चुका हूं मैं

अब इसे रास कुछ न आएगा 
दिल को गम चखा चुका हूं मैं

मुझे दुख है सो बस यही दुख है 
कि उस से दिल लगा चुका हूं मैं

सब रो रहे हैं फकत इक गम पर
जिस का जश्न मना चुका हूं मैं  

अब मुझे रात आगोश में लेगी 
अपना बिस्तर बना चुका हूं मैं 

अब मेरा क्या करेगी वो सोचो
जिसको अपना बता चुका हूं मैं

जो कुछ बचा है सो वो इक जां है 
बाकी सब कुछ लुटा चुका हूं मैं

अब 'अख़्तर' को नींद कैसे आएगी 
शब ए गम सुना चुका हूं मैं 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

सोमवार, 9 मार्च 2020

ghazal : lage hain ab

कुछ हम भी चाहते हैं वो हम-सुखन रहें 
कुछ वो भी नई बात बनाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी उसे चाहने के काबिल नहीं रहे 
कुछ वो भी हम से नज़रें चुराने लगे हैं अब 

कुछ हम चाहते हैं कि बर्बाद ही रहें
कुछ वो भी हम से दूरी बढ़ाने लगे हैं अब

कभी हम भी चाहते हैं कि उनसे डरे नहीं 
कुछ वो भी हमको आंख दिखाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि फुरकत सितम करे
कुछ वो भी हम को छोड़ के जाने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि हो उनका सामना 
कुछ वो भी मेरे सपनों आने लगे हैं अब 

कुछ हम भी चाहते हैं कि 'अख़्तर' तबाह हो 
कुछ वो भी मेरी ख़ाक उड़ाने लगे हैं अब 

Akhtar Parwez Dehlvi 

रविवार, 1 मार्च 2020

ग़ज़ल : क्या है

जब उसके पहलू मैं बैठूं तो फिर निस्बत क्या है
जब उससे दूर हो जाऊं तो फिर फ़ुर्क़त क्या है

माना हम दोनों में मोहब्ब्त नहीं गर है भी तो 
फिर भी हम दोनों को मिलने की जरूरत क्या है 

आजकल नाम तेरा अपने नाम से मिला कर लिखूं
गर ये नहीं हिम्मत तो फिर हिम्मत क्या है 

उसका सांस भी लेना अक्सर सुनाई देता है 
मैं क्या बताऊं यार तुझे की क़ुर्बत क्या है 

हजारों ज़ुल्म ओ सितम रोज़ सेहती है चुप चाप
और तुम ये कहते हो वो क्या है औरत क्या है 

हम नाकामियों में रश्क करने वाले लोग 
क्या करेगे ये जान के कि शोहरत क्या है

गर नहीं मैं तुझको पसंद ठीक है दुश्मन न समझ
वैसे 'अख़्तर' जानता है तोहमत क्या है नफ़रत क्या है 

अख़्तर परवेज़ देहलवी

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...