अभी तू मुझको अपने दिल से निकाल नहीं
अभी तो ख़ुश नुमा हूं कोई आशिक़ वाला हाल नहीं
हां मेरा यार रातों को छोड़ छड़ कर दिन में निकलता है
मगर इसका ये मतलब नहीं कि वो हिलाल नहीं
मरें वबा से तो करतें हैं गिनतियां ये लोग
मरें जो भूख से किसी को उसका ख़्याल नहीं
अपने अहबाबों को एक बार देख को सोचो
कि कुछ दिन घर में रहना इतना भी मुहाल नहीं
न कर घर में जरूरतों कि चीज़ें इकठ्ठी अख़्तर
यहां पर बस इक तेरी ज़िन्दगी का सवाल नहीं
पढ़ कुछ तू भी किताबों में जो लिखा है अख़्तर
शेख़ साहब कि सारी बातें भी तो हलाल नही
~अख़्तर परवेज़ देहलवी