बुधवार, 18 मार्च 2020

Ghazal : aisa bhi to ho sakta hai

मैंने सूखन बस तुम पे लिखा हो ऐसा भी तो हो सकता है
तुम ने मुझको पागल किया हो ऐसा भी तो हो सकता है

तेरे हुस्न-ओ-जमाल को मैंने चांद-सितारे कह डाले
ये सब मैंने झूठ कहा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

अपने रक़ीब कि इतनी खुशी को देख के मैंने ये सोचा 
वो भी तेरे पहलू से उठा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

माना 'अख़्तर' बे-कद्र सलीके वाला बे-हुनरी से राब्ता है 
पर ये सब मैंने तुम से सीखा हो ऐसा भी तो हो सकता है 

छुपते-छुपाते तेरी नज़रों से बज़्म में 'अख़्तर' आया हो
तुमने मुझको देख लिया हो ऐसा भी तो हो सकता है

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

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