ख्वाहिश ए शम्मा भूझा चुका हूं मैं
ऐसे खुद को डरा चुका हूं मैं
अब इसे रास कुछ न आएगा
दिल को गम चखा चुका हूं मैं
मुझे दुख है सो बस यही दुख है
कि उस से दिल लगा चुका हूं मैं
सब रो रहे हैं फकत इक गम पर
जिस का जश्न मना चुका हूं मैं
अब मुझे रात आगोश में लेगी
अपना बिस्तर बना चुका हूं मैं
अब मेरा क्या करेगी वो सोचो
जिसको अपना बता चुका हूं मैं
जो कुछ बचा है सो वो इक जां है
बाकी सब कुछ लुटा चुका हूं मैं
अब 'अख़्तर' को नींद कैसे आएगी
शब ए गम सुना चुका हूं मैं
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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