कुछ हम भी चाहते हैं वो हम-सुखन रहें
कुछ वो भी नई बात बनाने लगे हैं अब
कुछ हम भी उसे चाहने के काबिल नहीं रहे
कुछ वो भी हम से नज़रें चुराने लगे हैं अब
कुछ हम चाहते हैं कि बर्बाद ही रहें
कुछ वो भी हम से दूरी बढ़ाने लगे हैं अब
कभी हम भी चाहते हैं कि उनसे डरे नहीं
कुछ वो भी हमको आंख दिखाने लगे हैं अब
कुछ हम भी चाहते हैं कि फुरकत सितम करे
कुछ वो भी हम को छोड़ के जाने लगे हैं अब
कुछ हम भी चाहते हैं कि हो उनका सामना
कुछ वो भी मेरे सपनों आने लगे हैं अब
कुछ हम भी चाहते हैं कि 'अख़्तर' तबाह हो
कुछ वो भी मेरी ख़ाक उड़ाने लगे हैं अब
Akhtar Parwez Dehlvi
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