शुक्रवार, 27 मार्च 2020

ghazal

अभी तू मुझको अपने दिल से निकाल नहीं
अभी तो ख़ुश नुमा हूं कोई आशिक़ वाला हाल नहीं

हां मेरा यार रातों को छोड़ छड़ कर दिन में निकलता है
मगर इसका ये मतलब नहीं कि वो हिलाल नहीं

मरें वबा से तो करतें हैं गिनतियां ये लोग
मरें जो भूख से किसी को उसका ख़्याल नहीं

अपने अहबाबों को एक बार देख को सोचो
कि कुछ दिन घर में रहना इतना भी मुहाल नहीं

न कर घर में जरूरतों कि चीज़ें इकठ्ठी अख़्तर
यहां पर बस इक तेरी ज़िन्दगी का सवाल नहीं

पढ़ कुछ तू भी किताबों में जो लिखा है अख़्तर
शेख़ साहब कि सारी बातें भी तो हलाल नही

~अख़्तर परवेज़ देहलवी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...