कभी कभी तो लगता है उससे किनारा कर लूं
और कभी यूं भी लगता है बस गुज़ारा कर लूं
तमाम शहर को उसे देखने की चाहत है
मैं उस ग़ुलाब पे अपना ही इजारा कर लूं
वो उस चमन में रहता है अकेला तन्हा
वो ज़रा बाग़ में निकले तो नज़ारा कर लूं
अब तो तन्हाई ही रास आने लगी है 'अख़्तर'
मैं ये सोच रहा हूं अब इश्क़ दोबारा कर लूं
ताज़ा फसाने की चाहत नहीं 'अख़्तर' मुझको
कि उसी बेवफा को फिर से मैं गवारा कर लूं
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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