शनिवार, 4 अप्रैल 2020

Ghazal

कभी कभी तो लगता है उससे किनारा कर लूं
और कभी यूं भी लगता है बस गुज़ारा कर लूं

तमाम शहर को उसे देखने की चाहत है
मैं उस ग़ुलाब पे अपना ही इजारा कर लूं

वो उस चमन में रहता है अकेला तन्हा
वो ज़रा बाग़ में निकले तो नज़ारा कर लूं

अब तो तन्हाई ही रास आने लगी है 'अख़्तर'
मैं ये सोच रहा हूं अब इश्क़ दोबारा कर लूं

ताज़ा फसाने की चाहत नहीं 'अख़्तर' मुझको
कि उसी बेवफा को फिर से मैं गवारा कर लूं

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

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