बड़े बे-कद्र बड़े बे-ज़ार नज़र आते हैं
मय छलकाते हुए मयख्वार नज़र आते है
मैंने माना की सलीक़ा नहीं पीने का मगर
जाम हाथों में हो तो होश्यार नज़र आते हैं
हम कहां लिखते हैं खुद कलम ही लिखता है ग़ज़ल
और कुछ लोगों को हम फनकार नज़र आते हैं
बड़े प्यार से 'अख़्तर' कह कर पुकारा उसने
आज तो हश्र के कुछ असर नज़र आते है
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें