कुछ और शेर थे पर हमने वो कहे भी नहीं
कुछ यूं भी था कि वो शेर तुमने सुने भी नहीं
अब हम समझे की मोहब्बत में रही न बात वो
कि तुम नाराज़ भी थे और कुछ गिले भी नहीं
तुम्हारे होंठ कुछ आब ए बादा से लगे
जो एक बार चख ले तो कभी छूटे भी नहीं
वो आ तो गए थे 'अख़्तर' हमरी महफ़िल में
मज़ा तो ये था कि वो हमसे गले लगे भी नहीं
इस कद्र क्या नाराज़गी 'अख़्तर' से सनम
कि हम एक घर में रहे और तुम लड़े भी नहीं
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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