आज की रात कुछ और नज़ारे निकले
जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले
हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में
लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले
खो गया जिस्म कहीं रात के अंधेरों में
मिल गया जिस्म कोई और शरारे निकले
जागता जिस्म है सोने नहीं देता इक शब
ज़िन्दगी हम भी कुछ इस तरह गुज़रे निकले
हो गए बर्बाद किया ख़ुद को तबाह हमने भी
तब कहीं जा के इस दिल के ख़सारे निकले
तुम जो निकल आए रात में घर से अपने
ऐसा लगता है कि बे-वक़्त सितारे निकले
अब वो मुझे देख के कुछ ऐसे मुस्कुराते हैं
वो भी चाहते हैं कि अरमान हमारे निकले
परवेज़ अख़्तर