बुधवार, 29 जुलाई 2020

Ghazal

आज की रात कुछ और नज़ारे निकले 
जिसको देखा वही इश्क़ के मारे निकले

हो गई शाम तो रोते हुए विरानों में
लेके जिस्म अपना ख़ुद ही पुकारे निकले

खो गया जिस्म कहीं रात के अंधेरों में
मिल गया जिस्म कोई और शरारे निकले

जागता जिस्म है सोने नहीं देता इक शब
ज़िन्दगी हम भी कुछ इस तरह गुज़रे निकले

हो गए बर्बाद किया ख़ुद को तबाह हमने भी 
तब कहीं जा के इस दिल के ख़सारे निकले

तुम जो निकल आए रात में घर से अपने
ऐसा लगता है कि बे-वक़्त सितारे निकले

अब वो मुझे देख के कुछ ऐसे मुस्कुराते हैं
वो भी चाहते हैं कि अरमान हमारे निकले

परवेज़ अख़्तर

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

Ghazal : ho sakti hai

अपनी उससे भला बात भी हो सकती है 
ये भी हो सकता है खैरात भी हो सकती है

वो दानिस्ता हमारे दस्तरस से दूर हुए
और ये इश्क़ की रिवायात भी हो सकती है 

करीब इतना न आओ मुझे डर लगता है
करीब आने से इनायात भी हो सकती है 

ये भी सच है कि वो क़िस्मत में नहीं है मेरे
ये भी सच है कि मुलाक़ात भी हो सकती है

वो अलग बात है रुकना उसे कबूल न हो
ज़िन्दगी है, मुश्किल ए हालात भी हो सकती है 

ऐसा लगता है कि उसको डर है मेरे होना का
और 'अख़्तर' ये ख़्यालात भी हो सकती है

परवेज़ अख़्तर

शनिवार, 18 जुलाई 2020

ghazal

ख़बर सब कुछ है अच्छा है हमारा बेख़बर होना
यहां मंजर है मुश्किल है तुम्हारा चश्म-तर होना 

जब उन से कहता हूं तुम्हे मैं याद करता हूं
उनका हंस के ये कहना हमारा अजीब-तर होना

ये कैसा हुस्न है तेरा क़मर भी जल के मारता है 
आखिर किसको नसीब है तुम्हारा हम-सफ़र होना 

यही है सब जो करते हैं ख़ूब तन्क़ीद हमारी
किसको रास आएगा हमारा सुखनवर होना 

हुनर रखते हो ऐसा कि तुम्हें सब चाहते होंगे
ऐसे हुनर से अच्छा है हमारा बेहुनर होना 

लगे फ़िरक़ा-परस्ती में करो बदनाम 'अख़्तर' को 
अभी तुम्हें मलूम नहीं है हमारा शकेब-बर होना 

परवेज़ अख़्तर

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

नज़्म : घर जल्दी आ जाना

मुझ को ये बतलाओ 
क्या मां तुमसे कहती है ?
घर जल्दी आ जाना
घर से निकलने पर 
फ़िक्र उसको रहती है 
इसलिए वो कहती है 
घर जल्दी आ जाना

मां को एक डर है 
दुनिया के दरिंदों से 
जो मर चुके हैं अंदर से
क्या करेगी मां बोलो
मां तो मां होती है
उस को डर लगता है 
उसने दुनिया देखी है 
कैसे कुछ दरिंदे 
जिस्म नौच लेते हैं
रूह कांप जाती है 
इसलिए मां कहती है 
घर जल्दी आ जाना 

सोचो,
मां पे क्या गुजरती है 
रोज़ सोचा करती है
ये बात बस करती है 
घर जल्दी आ जाना
देर न लगना 
घर जल्दी आ जाना

परवेज़ अख़्तर

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Ghazal:

क्या मिला उसे इन आंखों को लहू कर के
वो मुझ को भूल गया मेरी आरज़ू कर के

यही एक ख़्वाहिश पर जीते रहें हम बरसों
करेगा हम से गिले हमको रु-ब-रु कर के

लब को चूम लिए और उसके बाद उसने
मुझे ही छोड़ दिया जिस्म-ए-रंग-ओ-बू कर के

मुझे पता है कि आप गैरों को कहा जाता है
मैं इंतज़ार में हूं कब बोलेगा मुझ को तू कर के 

चल 'अख़्तर' मान जा होता है ज़िन्दगी में यही
तुझे मिलेगा भी क्या उसकी जुस्तुजू कर के

परवेज़ अख़्तर

Ghazal

mere anshu gire jo zamin pe sabhi girte girte Sara asar rah gaya  main tadpta raha jaan niklati rahi tu udhar rah gyi mein idhar raha gaya  ...