क्या मिला उसे इन आंखों को लहू कर के
वो मुझ को भूल गया मेरी आरज़ू कर के
यही एक ख़्वाहिश पर जीते रहें हम बरसों
करेगा हम से गिले हमको रु-ब-रु कर के
लब को चूम लिए और उसके बाद उसने
मुझे ही छोड़ दिया जिस्म-ए-रंग-ओ-बू कर के
मुझे पता है कि आप गैरों को कहा जाता है
मैं इंतज़ार में हूं कब बोलेगा मुझ को तू कर के
चल 'अख़्तर' मान जा होता है ज़िन्दगी में यही
तुझे मिलेगा भी क्या उसकी जुस्तुजू कर के
परवेज़ अख़्तर
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