सोमवार, 25 मई 2020

नज़्म : रोना होगा

एक रोज़ रोने की ख्वाइश थी तो
मुद्दतों बाद मैं आंखों में पानी लाया
वो मंजर जो किसी और से देखे न गए 
यूं सभी मंजर की निशानी लाया

मैं अपने अश्कों से आज बहुत शर्मिंदा हूं
एक ज़माने से इन्हे कैदी बना रखा था
मैं बस झूठी ख़ुशी को अपना कहता था
और दर्द ओ ग़म को मैंने छिपा रखा था

एक चलन झूठ का ये था मैं भला क्या करता 
की मर्द रोते नहीं आंखों को बिगोते नहीं 

इसी एक झूठ ने मुझ को है बर्बाद किया 
हर एक दिन मुझे नाशाद पे नाशाद किया 

अब मुझे कुछ नहीं आता तो इतना ही सही 
फूट कर आज मुझे रोना होगा 
जो लगे दाग़ हैं ऐसे तो धुल नहीं सकते 
मुझे अपने लहू से इन्हे धोना होगा

अब इस झूठ को दुनिया से ही जाना होगा
'अख़्तर' तुझे पहले रो के दिखाना होगा 

परवेज़ अख़्तर

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