ऐ ज़िन्दगी तुझे अल्फ़ाज़ों में बयां कर नहीं सकता
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता
चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता
खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता
अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
तू ज़ख़्म ऐसे देती है जो भर नहीं सकता
चुप हूँ जो अपने हालत पे तो कमज़ोर न समझ
ऐसा भी न समझ की में कुछ कर नहीं सकता
खुश भी इसलिए हूँ की हारना कबूल है
में चंद ठोकरों से तो डर नहीं सकता
अख़्तर तू अपने आदत से जल्दी से बाज़ आ
ऐसी भी क्या शर्म की तू मर नहीं सकता
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
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