सोमवार, 27 मई 2019

ग़ज़ल : अच्छा होता

तू सबके साथ ना चलता तो अच्छा होता
कभी खुद से भी मिलता तो अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों को समझता तो अच्छा होता
फिर मुझे मोहब्बत करता तो अच्छा होता

मेरे सनम तूने मुझे ये क्या बना डाला है
मेरा दिल पहले सा सच्चा होता तो अच्छा होता

मेरी जुबां को क़लम से काट कर बोला
काश तू झूठ ही कहता तो अच्छा होता

तू इतना परेशान है सदाक़त पसंद लगता है
वरना तेरा भी शहर में घर तो अच्छा होता

कल तुमने जो मुझे से बात कही थी 'अख़्तर'
वो बात खुद से भी कहता तो अच्छा होता 

उसने सच बोलने पे पाबंदी लगा रखी है
अख़्तर तू शायर न होता तो अच्छा होता

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

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