रविवार, 19 मई 2019

Ghazal: मुस्कुरा देता हूं

अब तो हालातों पे में मुस्कुरा देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं

तसव्वुर में तो वो रहती है मगर न जाने 
मै किसी और की तसवीर बना देता हूं

अब मुझे याद नहीं रहता कुछ उसके सिवा
न जाने किस-किस को अपने शेर सुना देता हूं

जमाल-ए-यार तो ना खुश ही नजर आता है
जब उसका नाम अपने नाम से मिला देता हूं

आंख नम है और होंठों पे तबस्सुम 'अख़्तर'
दुश्मन-ए-जां को कुछ ऐसे सज़ा देता हूं

AKHTAR PARWEZ DEHLVI

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