अब तो हालातों पे में मुस्कुरा देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं
अपने गम को कुछ ऐसे भुला देता हूं
तसव्वुर में तो वो रहती है मगर न जाने
मै किसी और की तसवीर बना देता हूं
अब मुझे याद नहीं रहता कुछ उसके सिवा
न जाने किस-किस को अपने शेर सुना देता हूं
जमाल-ए-यार तो ना खुश ही नजर आता है
जब उसका नाम अपने नाम से मिला देता हूं
आंख नम है और होंठों पे तबस्सुम 'अख़्तर'
दुश्मन-ए-जां को कुछ ऐसे सज़ा देता हूं
AKHTAR PARWEZ DEHLVI
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें