सो अब नहीं जाएंगे कहीं अपने घर से हम
मुझ को नहीं पता हरम नहीं बुतकदे ग़म
रखते हैं वास्ता बस तेरी रहगुज़र से हम
कभी हम कलाम भी हो कभी कैफ़ ए बहारांँ
करते हैं ये उम्मीद तेरी ख़ुशनज़र से हम
ये बेरुख़ी ये बेदिली ये बेज़ौक़ संग ए दिल
तू ही बता ऐ आश्ना गुज़रे किधर से हम
आए थे दर ए बिस्मिलॉ लेने हिसाब ए इश्क़
लौटे हैं बे क़ुसूर ही उस संग ए दर से हम
बख़्शी नही ज़रा भी कमी सीना किया है चाक
कुछ बा-हुनर तो वो भी हैं कुछ दाद-गर से हम
परवेज़ अख़्तर
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