शनिवार, 11 जनवरी 2020

ghazal : dagaa kar ke

फंसा दिया है तूफ़ान में किनारे ने दग़ा कर के
उसे सकून तो होगा मुझ को फ़ना कर के

समुंदर भी तो रोया था ज़ालिम तेरी ज़ुल्मत पर
वो अपना दुख बताता है किनारे से टकरा के

ये तेरा खुमार ए हुस्न मुझे बेकरार करता है
मैं तुझसे इसलिए मिलता हूं थोड़ा सा नशा कर के

मेरी आखों की बेचैनी तुझे बर्बाद न कर दे
मैं तुझसे बात करता हूं नज़रों को झुका कर के

सितारों मेरा दुख समझो झगडों न आसमां से तुम
तुम मेरा दर्द बढ़ा दोगे ज़मीं को खफा कर के

पिला न उनको अब साक़ी मीना मेरी ओर कर लेतू

 'अख़्तर' को होश में ले आ थोड़ी सी चखा कर के 

~अख़्तर परवेज़ देहलवी 

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Ghazal

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