वो मुझ से यूं झगड़ता रहा बात बात पे
मैं भी ग़ज़ल लिखता रहा बात बात पे
झगड़े में कितनी बार लिया लब का बोसा
और वो आंखों को मलता रहा बात बात पे
मैंने अभी तक इश्क़ का किया नहीं इज़हार
लेकिन मैं उससे मिलता रहा बात बात पे
एक साथ सैकड़ों से इश्क़ मैंने कर लिया
उसके बाद मैं हँसता रहा बात बात पे
'अख़्तर' यकीं कर मेरा जादू निगाह है वो
और मैं आंखे ही देखता रहा बात बात पे
Akhtar Parwez Dehlvi
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