साक़ी अब वो बात नहीं पैमाने में
बस बादा है तेरे इस बादा-खाने में
मेरी रात गुजरती थी उसके चौखट पर
फिर मुझे ढूंढने क्यूं आए हो मयखाने में
एक तो उसकी जुदाई उपर से गम-ए-फ़िराक़
और एक तो जी भी नहीं लग रहा वीराने में
मर गया 'अख़्तर' चलो जान छुट्टी उस पागल से
ये जुमला गूंज रहा था सनम खाने में
~अख़्तर परवेज़ देहलवी
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