कहेंगे ज़ालिम को ज़ालिम, ज़रा भी कम नहीं होंगे
भले वो कुछ भी हो जाएं, कभी मोहतरम नहीं होंगे
मैं इसका ख़ुद ही शाहिद हूं तुम्हें कैसे पता होगा
तुम्हें लगता है कैसे, हंसते चेहरों को ग़म नहीं होंगे
मैं हंसता हूं या रोता हूं, ये काम खिलवत में होता है
अगर सर ए बाज़ार रोऊं तो, फिर वो पुर-नम नहीं होंगे
ये कैसा इश्क़ है तेरा, फ़ना होना तो लाज़िम था
जब वो मुझ को चूमेगा फिर वो हम, हम नहीं होंगे
तू मुझ को अब तो न तड़पा, करीब आजा करीब आजा
कहीं ऐसा न हो तू आए और दो अलम नहीं होंगे
'अख़्तर' में हुनर इक है वो रोता है बस रोता है
रोने का भी इक ग़म है कि वो पुर-ग़म नहीं होंगे
परवेज़ अख़्तर
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