ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने हैं ये भी तो इक अफ़त है
ये तेरी झुकी नज़रें मुझ को तो सताती है
आखों की रनाई भी इक हश्र बरपाती है
मेरी परेशान आंखे इक अक्स बनाती है
फिर तेरी तबस्सुम मुझ को बताती है
की ये हुस्न ए इबादत है ये हुस्न ए इबादत है
ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है
अगर ये पूछ लूं मैं तुझसे नाराज़ तू न होना
नज़रें झुका कर आखिर तू किसको सोचती है
मैं तो हूं तेरे जानिब मैं तो हूं तुझ से वाकिफ
क्या तू मुझको सोचती है क्या तू मुझको सोचती है
में जान गया तुझको पहचान गया तुझको
की ये तेरी रिवायत है ये तेरी रिवायत है
ये हुस्न ए सितम तेरा इक नाज़ नज़ाकत है
हम तेरे दीवाने है ये भी तो इक अफ़त है
~ अख़्तर परवेज़ देहलवी
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